आसाराम बापू को क्या खत्म करने की हुई कोशिश ? बापू के खिलाफ राजनीतिक घेराबंदी ?

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What attempt was made to eliminate Asaram Bapu? 

एक ऐसा नाम जिन्हें कौन नहीँ जानता इतने गम्भीर आरोप लगने के बाद आज भी वे करोड़ों समर्थकों के दिलो में जो राज करते है उन्हें उनके समर्थक बापू कहकर पुकारते हैं जिन्हें दुनिया आसाराम बापू के नाम से जानती हैं।वहीँ सोशल मीडिया में एक मैसेज बहुत तेजी से वयरल हो रहा है,वायरल मैसेज के तहत आसाराम बापू के खिलाफ राजनीतिक घेराबंदी ?क्या उन्हें खत्म करने की कोशिश हुई, ताकि हिंदू समाज उनसे दूर हो जाए? ये तमाम तरह की बातें सामने आई हैं।

वायरल मेसेज 

वायरल मैसेज के अनुसार एक सवाल आज भी बहुत से लोगों के मन में है की क्या आसाराम बापू को केवल कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा, या 2013 के बाद उनके खिलाफ ऐसा राजनीतिक और मीडिया वातावरण भी बना, जिसका परिणाम उन्हें हिंदू समाज के बीच से हाशिए पर पहुँचाने के रूप में सामने आया?यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आसाराम बापू कभी देश के सबसे बड़े धार्मिक जनाधार वाले संतों में गिने जाते थे।

Indian Express की रिपोर्ट का हवाला 

वहीं वायरल मैसेज में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसके अनुसार 2013 में Indian Express ने उन्हें लगभग 2 करोड़ अनुयायियों वाला संत बताया था और उनके ट्रस्ट के करीब 400 आश्रमों का उल्लेख किया था। एक अन्य Indian Express रिपोर्ट में भी करीब 2 करोड़ अनुयायियों और लगभग 400 आश्रमों का उल्लेख मिलता है।लेकिन आसाराम बापू का प्रभाव केवल आश्रमों और सत्संग तक सीमित नहीं था।

करोड़ों साधक और इतने बड़े स्तर पर चलने वाले कार्य

आसाराम बापू से जुड़े संस्थानों और आश्रमों में वर्षों से कई तरह की गतिविधियाँ चलती रही हैं।Indian Express की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, उनके संगठन से जुड़े लगभग 40 गुरुकुल, स्कूल, एक प्रिंटिंग प्रेस और आयुर्वेद से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। उसी रिपोर्ट में करीब 400 आश्रम, 12 देशों में मौजूदगी और 50 से अधिक स्कूलों का भी उल्लेख किया गया था।

इन संस्थाओं में क्या-क्या काम बताए जाते थे?

1. गुरुकुल और शिक्षा

आसाराम बापू से जुड़े गुरुकुलों में आधुनिक शिक्षा के साथ योग, संस्कार, अनुशासन और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को जोड़ने की बात कही गई।वर्तमान गुरुकुल वेबसाइट भी आधुनिक विज्ञान और वैदिक आध्यात्मिकता के संयोजन तथा विद्यार्थियों में अनुशासन, सत्य, सरलता और चरित्र निर्माण पर जोर बताती है।और यह केवल संगठन का दावा भर नहीं है।CBSE के SARAS पोर्टल पर भोपाल स्थित “Sant Sri Asaramji Bapu Gurukul” का रिकॉर्ड मौजूद है, जिसमें उसकी affiliation की जानकारी दर्ज है।

2. बाल संस्कार केंद्र

बच्चों के लिए बाल संस्कार केंद्रों में योग, प्राणायाम, ध्यान, मंत्र, नैतिक शिक्षा, माता-पिता और बुजुर्गों के सम्मान तथा आत्म-अनुशासन जैसी गतिविधियों पर जोर दिया जाता है।आश्रम की वर्तमान वेबसाइट पर 17,000 बाल संस्कार केंद्रों का दावा किया गया है।यह संगठन का स्वयं प्रकाशित आंकड़ा है, इसलिए इसे स्वतंत्र सर्वेक्षण का आंकड़ा नहीं माना जा सकता।लेकिन यह जरूर दिखाता है कि संगठन आज भी इस गतिविधि को अपने काम का एक प्रमुख हिस्सा मानता है।

3. योग, ध्यान और साधना

आश्रमों में प्रार्थना, साधना, सत्संग, ध्यान और योग जैसी गतिविधियाँ लंबे समय से होती रही हैं।2013 में Indian Express ने रिपोर्ट किया था कि गिरफ्तारी के बाद भी अहमदाबाद और सूरत के आश्रमों में दैनिक जप और साधना में सैकड़ों अनुयायी शामिल होते रहे।और यह गतिविधियाँ केवल 2013 तक सीमित नहीं रहीं।तो वहीं 2024 में Times of India ने आसाराम बापू आश्रम में आयोजित दिवाली शिविर की रिपोर्ट करते हुए प्रार्थना, सत्संग, ध्यान, योगासन, धार्मिक ग्रंथों का पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कीर्तन जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया।रिपोर्ट के अनुसार इसमें हजारों लोगों और बच्चों ने भाग लिया।यानी:13 साल बाद भी धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।

4. सेवा समितियाँ

आश्रम की वर्तमान वेबसाइट के अनुसार दुनिया भर में 1,500 सेवा समितियाँ बताई गई हैं।इन समितियों को आश्रम द्वारा समाज सेवा और निष्काम सेवा से जोड़ा गया है।फिर से स्पष्ट कर दें:यह संस्था द्वारा प्रकाशित वर्तमान आंकड़ा है, स्वतंत्र सरकारी सर्वेक्षण नहीं।लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि संगठन आज भी अपने सेवा नेटवर्क को सक्रिय बताता है।

5. बड़े सामूहिक आध्यात्मिक कार्यक्रम

2013 की Indian Express रिपोर्ट में पुणे के कालेगांव आश्रम में लगभग 25,000 लोगों की क्षमता वाले बड़े शेड और नियमित सत्संग का उल्लेख किया गया था।उसी रिपोर्ट में पुणे में लगभग 500 बाल संस्कार केंद्र चलने और करीब 2 लाख बच्चों के परीक्षाओं में शामिल होने का संगठन की ओर से दावा बताया गया था।इससे कम से कम यह स्पष्ट होता है कि आसाराम बापू से जुड़ा संगठन केवल एक आश्रम या कुछ धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं था।यह एक बड़ा:शिक्षा + संस्कार + साधना + सेवा नेटवर्क था।और आज भी क्या कुछ चल रहा है?यही बात इस पूरी कहानी को और महत्वपूर्ण बनाती है।13 साल से अधिक समय जेल में रहने के बावजूद संगठन की वर्तमान वेबसाइट पर आज भी:400 आश्रम 1,500 सेवा समितियाँ17,000 बाल संस्कार केंद्र 40 गुरुकुल जैसी गतिविधियों और संस्थागत ढांचे का उल्लेख मौजूद है।इन सभी वर्तमान आंकड़ों की पूर्ण स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन्हें संगठन के self-reported figures के रूप में देखना चाहिए।लेकिन स्वतंत्र स्रोत भी दिखाते हैं कि गतिविधियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।2024 में Times of India ने हजारों लोगों की भागीदारी वाले दिवाली शिविर की रिपोर्ट की।अर्थात:13 साल की जेल के बाद भी संगठन की गतिविधियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।तो फिर सवाल और बड़ा हो जाता है अगर आसाराम बापू का प्रभाव केवल राजनीतिक संरक्षण, मीडिया प्रचार या व्यक्तिगत लोकप्रियता पर आधारित था, तो इतने लंबे समय बाद भी उनके नाम से जुड़े:आश्रम क्यों मौजूद हैं?गुरुकुल क्यों चल रहे हैं?बाल संस्कार केंद्र क्यों चल रहे हैं?सेवा समितियाँ क्यों सक्रिय हैं?सत्संग और आध्यात्मिक शिविर क्यों हो रहे हैं?और सबसे महत्वपूर्ण:उनके अनुयायी आज भी उनसे क्यों जुड़े हुए हैं?इसका उत्तर केवल “अंधभक्ति” कहकर समाप्त कर देना शायद पर्याप्त नहीं है।यह समझना भी जरूरी है कि इन लोगों का संबंध किन गतिविधियों, संस्थाओं और आध्यात्मिक विचारों से बना हुआ है।क्या हिंदू समाज को आसाराम बापू से दूर करने की कोशिश हुई?यहीं से सबसे गंभीर सवाल सामने आता है।

समर्थकों का आरोप

आसाराम बापू के समर्थकों का आरोप है कि 2013 के बाद केवल कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि ऐसा व्यापक मीडिया और सामाजिक वातावरण भी बना जिससे हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से को उनसे दूर किया गया।यह कहना कि सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर उन्हें खत्म करने की कोई संयुक्त योजना बनाई थी, उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों से सिद्ध नहीं है।लेकिन घटनाओं का क्रम सवाल जरूर पैदा करता है:एक विशाल धार्मिक जनाधार।

गिरफ्तारी।

मीडिया में लगातार नकारात्मक कवरेज।

राजनीतिक दूरी।

लंबी जेल।

और फिर भी संगठनात्मक गतिविधियों का जारी रहना।तो सवाल है क्या किसी संत को जेल में डाल देना उसके विचार, संस्थाओं और अनुयायियों को भी समाप्त कर देता है?आसाराम बापू के मामले में उपलब्ध सामग्री कम से कम यह दिखाती है कि ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ।

नरेंद्र मोदी और भाजपा का सवाल

2013 से पहले आसाराम बापू का सामाजिक प्रभाव इतना बड़ा था कि Indian Express ने उनके करीब 2 करोड़ अनुयायियों और 400 आश्रमों का उल्लेख किया था।उस दौर में उनके राजनीतिक संपर्क भी चर्चा में रहे।लेकिन 2013 में गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने उनके बचाव में दिए गए कुछ नेताओं के बयानों से दूरी बनाई।और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरे धार्मिक संतों के साथ सार्वजनिक मंच साझा करते दिखाई देते हैं।23 फरवरी 2025 को प्रधानमंत्री मोदी बागेश्वर धाम के कार्यक्रम में पहुँचे और धीरेंद्र शास्त्री की सार्वजनिक प्रशंसा करते हुए उन्हें “मेरे छोटे भाई” कहा। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक भाषण में यह संबोधन दर्ज है।यह किसी षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है।लेकिन तुलना करने पर सवाल जरूर उठता है:आसाराम बापू के मामले में राजनीतिक दूरी और दूसरे धार्मिक संतों के साथ सार्वजनिक निकटता में इतना अंतर क्यों?क्या राजनीतिक और वैचारिक ताकतें अलग-अलग कारणों से एक ही दिशा में खड़ी हुईं?आसाराम बापू के समर्थकों का यह भी आरोप है कि अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक समूहों ने अलग-अलग कारणों से उनके खिलाफ माहौल बनाया।इस आरोप की कोई संयुक्त, निर्णायक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।लेकिन एक सवाल जरूर है:क्या अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों की आलोचना, मीडिया की लगातार नकारात्मक कवरेज और राजनीतिक दूरी ने मिलकर ऐसा वातावरण बनाया जिसमें हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा आसाराम बापू से दूर हो गया?अगर हाँ, तो इसका प्रभाव कितना था?और अगर नहीं, तो इतने बड़े जनाधार वाले संत का प्रभाव 13 साल बाद भी पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हुआ?

अंतिम सांस तक जेल” वाली सजा

यहाँ एक महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य भी सामने रखना जरूरी है।2018 में ट्रायल कोर्ट ने आसाराम बापू को नाबालिग से बलात्कार के मामले में आजीवन कारावास की सजा दी।फैसले में सजा को इस रूप में दर्ज किया गया:“Life Imprisonment (The remainder of Natural Life of the Accused)”अर्थात:प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कारावास।2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी मुख्य दोषसिद्धि और यह आजीवन कारावास बरकरार रखा।व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि यह life imprisonment उनके प्राकृतिक जीवन के अंत तक चल सकती है।यानी सवाल:क्या इसका अर्थ यह हो सकता है कि आसाराम बापू का जीवन का अंतिम चरण भी जेल में ही बीते?

मेडिकल बेल नहीं?

वहीं जब 24 घंटे caregiver की जरूरत पड़ी, तब भी मेडिकल बेल नहीं 2026 में आसाराम बापू ने स्वास्थ्य के आधार पर सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मांगी।AIIMS की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जेल में अपनी पसंद का प्रशिक्षित caregiver 24 घंटे रखने की अनुमति दी।लेकिन मेडिकल बेल नहीं दी गई।अर्थात:24 घंटे देखभाल की जरूरत।लेकिन:जेल से बाहर आने की अनुमति नहीं।

यहाँ उनके समर्थकों का सवाल ?

85 वर्ष से अधिक उम्र, 13 साल से अधिक कारावास और 24 घंटे प्रशिक्षित देखभाल की आवश्यकता के बावजूद क्या जेल ही एकमात्र विकल्प है?सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2026 में AIIMS की रिपोर्ट के आधार पर full-time caregiver की अनुमति दी थी; रिपोर्ट के अनुसार AIIMS ने कहा था कि अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन round-the-clock care की जरूरत थी।क्या व्यवस्था उन्हें जीवन के अंतिम समय तक जेल में रखना चाहती है?यह कहना कि “सरकार और पूरा सिस्टम उन्हें खत्म करना चाहता है”, बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के स्थापित तथ्य नहीं है।लेकिन उनके समर्थकों के लिए घटनाओं की श्रृंखला यह सवाल जरूर पैदा करती है:क्या व्यवस्था का कठोर रवैया व्यावहारिक रूप से उन्हें उनके जीवन के अंतिम समय तक जेल में रखने की दिशा में नहीं ले जा रहा?क्योंकि तस्वीर सामने है:13 साल से अधिक जेल।85 वर्ष से अधिक उम्र।गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ।24 घंटे caregiver की आवश्यकता।प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक कारावास की सजा।और फिर भी:मेडिकल बेल नहीं।क्या किसी संत की आस्था को राजनीतिक रूप से खत्म किया जा सकता है?शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।किसी व्यक्ति को जेल में रखा जा सकता है।उसकी राजनीतिक पहुंच खत्म हो सकती है।उसकी सार्वजनिक छवि बदली जा सकती है।मीडिया का narrative बदल सकता है।लेकिन:क्या किसी संत से जुड़े वर्षों पुराने आध्यात्मिक और सामाजिक नेटवर्क को इतनी आसानी से समाप्त किया जा सकता है?उपलब्ध सामग्री बताती है कि 13 साल बाद भी उनके संगठन से जुड़े आश्रम, गुरुकुल, बाल संस्कार केंद्र, सेवा समितियाँ और धार्मिक कार्यक्रम मौजूद हैं।यही कारण है कि सवाल आज भी जिंदा है।अंतिम सवाल क्या आसाराम बापू को केवल एक कानूनी मामले के रूप में देखना पर्याप्त है?या फिर यह भी देखना होगा कि 2013 से पहले उनका सामाजिक और धार्मिक प्रभाव कितना बड़ा था?उनके कितने संस्थान और गतिविधियाँ थीं?उनके अनुयायी किन कार्यों से जुड़े थे?2013 के बाद राजनीतिक दूरी क्यों बनी?मीडिया ने उनके बारे में किस तरह की तस्वीर बनाई?अदालतों में मामले के किन हिस्सों पर क्या निष्कर्ष निकले?और 13 साल से अधिक समय बाद भी उनका संस्थागत और अनुयायी आधार पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हुआ?

सबसे महत्वपूर्ण:

क्या हिंदू समाज को आसाराम बापू से दूर करने की कोशिश हुई?और अगर हुई, तो:किसने की? क्यों की? और किस उद्देश्य से की?इन सवालों का उत्तर भावनाओं से नहीं, पूरे रिकॉर्ड, दस्तावेजों और प्रमाणों से मिलना चाहिए।लेकिन सवाल पूछना भी बंद नहीं होना चाहिए।क्योंकि 13 साल बाद भी यह कहानी खत्म नहीं हुई है।

 

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