आसाराम बापू की पेरोल से इतनी आपत्ति क्यो है सरकार ? हाईकोर्ट ने पूछा आदेश का पालन क्यों नहीँ हुआ

Why does the government have so much objection to Asaram Bapu’s parole?
कहते हैं समय बदलते देर नहीँ लगती एक समय था जब बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी पार्टी के नेता न सिर्फ आसाराम बापू के सत्संग में जाते थे बल्कि मंच से उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे लेकिन आज जब विपरीत समय है तो अपने आपको सनातनी पार्टी कहने वाली पार्टी की सरकार ही आसाराम बापू की पेरोल तक का विरोध करती है ये हम नहीं कह रहे हैं इस बात की चर्चा पूरे देश मे है।दरसअल आसाराम बापू को राजस्थान हाईकोर्ट से 20 दिनों की पेरोल मिली थी लेकिन जेल प्रबंधन कोर्ट के आदेश को न मानते हुए उन्हें इस पेरोल का लाभ नहीँ दे रहे थे जिसपर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने प्रशासन से पूछा की उनके आदेश का पालन क्यों नहीं हो रहा है ?
यह है मामला,
खबरों की मानें तो आसाराम बापू की 20 दिन की पैरोल को लेकर राजस्थान सरकार और हाईकोर्ट के बीच सामने आये विवाद कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। मामला केवल पैरोल मिलने या न मिलने का नहीं है, बल्कि इससे बड़ा सवाल यह है कि जब राजस्थान हाईकोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को आसाराम बापू को 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी थी, तो उस आदेश पर अमल क्यों नहीं हुआ? 6 अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी मामले में राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि 3 अगस्त के आदेश का पालन करते हुए आसाराम बापू को 20 दिन की पैरोल पर रिहा किया जाए और अगली सुनवाई में अनुपालन रिपोर्ट पेश की जाए।यानी जिस आदेश पर प्रशासन को अमल करना था, उसकी पालना सुनिश्चित कराने के लिए अदालत को दोबारा हस्तक्षेप करना पड़ा।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील क्यों नहीं मानी?
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से गुजरात में आसाराम बापू को मिली अलग सजा का हवाला दिया गया। सरकार का तर्क था कि गुजरात में भी आसाराम बापू को दोषी ठहराया गया है और वहां उनकी पैरोल से जुड़ी राहत नहीं मिली है।लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।अदालत ने स्पष्ट किया कि गुजरात में किसी दूसरे मामले में दोषी ठहराए जाने का मतलब यह नहीं है कि राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दी गई पैरोल अपने आप खत्म हो जाएगी।यहां सवाल यह है कि यदि सरकार को इस आधार पर पैरोल पर आपत्ति थी, तो क्या उसे पहले ही अदालत के सामने पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया जाना चाहिए था?
सबसे बड़ा सवाल: फिर 3 अगस्त का आदेश लागू क्यों नहीं हुआ?
आसाराम बापू की ओर से अदालत को बताया गया कि 3 अगस्त को 20 दिन की पैरोल मंजूर होने के बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया।इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल किया कि क्या 3 अगस्त के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है?सरकार की ओर से ऐसी कोई याचिका दाखिल किए जाने की जानकारी नहीं दी गई।यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।अगर सरकार को हाईकोर्ट का आदेश गलत लगता था, तो उसके पास उसे ऊपरी अदालत में चुनौती देने का रास्ता था। लेकिन अगर आदेश पर कोई रोक नहीं थी, तो फिर प्रशासन ने उसे लागू क्यों नहीं किया? क्या आसाराम बापू को अदालत के आदेश के बावजूद जेल में रखना सही था? यह सवाल इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू बन गया है। 3 अगस्त 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम बापू को 20 दिन की पैरोल देने का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके बावजूद रिहाई नहीं हुई और अंततः आसाराम बापू की ओर से फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।6 अक्टूबर को अदालत को दोबारा हस्तक्षेप करते हुए सरकार को आदेश की पालना करने और अनुपालन रिपोर्ट देने को कहना पड़ा।यहां सवाल उठना स्वाभाविक है कि 3 अगस्त से 6 अक्टूबर तक अदालत के आदेश की पालना क्यों नहीं हुई? यदि आदेश पर कोई रोक नहीं थी और उसे रद्द या बदलने के लिए कोई ऊपरी अदालत का आदेश भी नहीं था, तो राजस्थान पुलिस और जेल प्रशासन किस आधार पर आसाराम बापू की रिहाई रोक रहे थे?यह सवाल राजस्थान सरकार और प्रशासन से पूछा जाना चाहिए।हालांकि उपलब्ध आदेशों के आधार पर इसे सीधे “गैरकानूनी हिरासत” कहना उचित नहीं होगा, लेकिन अदालत के आदेश की पालना में हुई देरी की कानूनी और प्रशासनिक वजह बताना सरकार की जिम्मेदारी जरूर बनती है।
हाईकोर्ट पहले ही प्रशासन की आशंकाओं पर सवाल उठा चुका था
यह पहली बार नहीं है जब आसाराम बापू की पैरोल के मामले में हाईकोर्ट ने प्रशासन की आपत्तियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया हो।3 अगस्त के आदेश में प्रशासन की ओर से आसाराम बापू के बाहर आने पर कई तरह की आशंकाएं जताई गई थीं।लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को “misleading and figment of the imagination, without any basis” कहा था।आसान हिंदी में कहें तो अदालत को ये आशंकाएं भ्रामक और बिना ठोस आधार की कल्पना लगीं।द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि पहले जब आसाराम बापू को अंतरिम राहत मिली थी, तब उनके द्वारा उसका गलत इस्तेमाल करने या समाज अथवा किसी गवाह को नुकसान पहुंचाने का कोई मामला सामने नहीं आया था।अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आसाराम बापू 13 साल, 1 महीने और 24 दिन जेल में रह चुके थे।
जब कोर्ट ने आशंकाओं को ठोस आधार वाला नहीं माना, फिर सरकार इतनी सख्त क्यों?
यहीं से राजस्थान सरकार की भूमिका पर सवाल उठता है।सरकार को अदालत में अपना पक्ष रखने और पैरोल का विरोध करने का पूरा अधिकार है।पुलिस अपनी रिपोर्ट दे सकती है।प्रशासन अपनी आपत्तियां रख सकता है।लेकिन जब अदालत उन आपत्तियों पर विचार करने के बाद अपना फैसला सुना देती है, तो उसके बाद प्रशासन की जिम्मेदारी अदालत के आदेश को लागू करने की होती है।ऐसे में सवाल बिल्कुल सीधा है की आसाराम बापू की पैरोल को लेकर राजस्थान सरकार इतनी सख्ती क्यों दिखा रही है? अगर सरकार को कोई गंभीर और नई जानकारी मिली थी, तो उसे अदालत के सामने रखना चाहिए था।अगर सरकार को 3 अगस्त के आदेश पर आपत्ति थी, तो उसे ऊपरी अदालत में चुनौती देनी चाहिए थी।लेकिन यदि न आदेश पर रोक थी और न उसे चुनौती देकर बदला गया था, तो फिर उसकी पालना में देरी क्यों हुई?
क्या प्रशासन अदालत के आदेश से ऊपर हो सकता है?
यह इस पूरे मामले का सबसे गंभीर सवाल है।सरकार अदालत के फैसले से असहमत हो सकती है।सरकार उसके खिलाफ ऊपरी अदालत में जा सकती है।लेकिन जब किसी आदेश पर रोक नहीं है, तो प्रशासन द्वारा अपनी तरफ से उसकी पालना रोकना गंभीर सवाल खड़े करता है।6 अक्टूबर की सुनवाई में हाईकोर्ट ने इसी विषय पर सरकार को दोबारा निर्देश दिया और रिहाई की अनुपालन रिपोर्ट मांगी।यह केवल आसाराम बापू का मामला नहीं है।यह सवाल उस व्यवस्था से जुड़ा है जिसमें अदालत आदेश देती है और प्रशासन को उसका पालन करना होता है।
सरकार के सामने अब कई सीधे सवाल
राजस्थान सरकार से पूछा जाना चाहिए
1. 3 अगस्त के हाईकोर्ट आदेश के बाद आसाराम बापू को रिहा क्यों नहीं किया गया?
2. अगर सरकार को आदेश पर आपत्ति थी तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों नहीं दी गई?
3. जब हाईकोर्ट ने प्रशासन की कई आशंकाओं को ठोस आधार के बिना माना, तो उन्हीं आशंकाओं को पैरोल रोकने का आधार क्यों बनाया गया?
4. गुजरात में हुई कार्रवाई को राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश की पालना रोकने का आधार क्यों बनाया गया?
5. क्या पुलिस या जेल प्रशासन के पास कोई ऐसा आदेश था जो हाईकोर्ट के 3 अगस्त के आदेश के बाद भी आसाराम बापू की रिहाई रोकने की अनुमति देता था?
6. आखिर हाईकोर्ट को अपने ही आदेश की पालना कराने के लिए दोबारा निर्देश क्यों देना पड़ा?
पैरोल का मतलब सजा खत्म होना नहीं है
यह बात भी स्पष्ट रहनी चाहिए कि 20 दिन की पैरोल का अर्थ आसाराम बापू की सजा खत्म होना या उन्हें बरी किया जाना नहीं है।राजस्थान हाईकोर्ट ने मई 2026 में नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आसाराम बापू की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी, जबकि गैंगरेप के आरोप में उन्हें दोषमुक्त किया था।इसलिए 3 अगस्त का आदेश केवल 20 दिन की सीमित पैरोल से संबंधित था। यानी यहां चर्चा का विषय दोषसिद्धि नहीं, बल्कि अदालत द्वारा मंजूर की गई पैरोल के आदेश की पालना है।क्या आसाराम बापू के मामले में सामान्य प्रक्रिया से ज्यादा सख्ती हो रही है?यह कहना कि राजस्थान की भाजपा सरकार व्यक्तिगत रूप से आसाराम बापू से “नफरत” करती है, बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के एक राजनीतिक निष्कर्ष होगा। लेकिन घटनाक्रम एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है क्या आसाराम बापू के मामले में प्रशासन जरूरत से ज्यादा सख्ती कर रहा है? एक तरफ सरकार ने पैरोल के खिलाफ कई कारण रखे।दूसरी तरफ हाईकोर्ट ने 3 अगस्त को उन आपत्तियों पर विचार करने के बाद 20 दिन की पैरोल मंजूर की।और जब उस आदेश की पालना नहीं हुई, तो 6 अक्टूबर को हाईकोर्ट को फिर कहना पड़ा कि आदेश का पालन करो और रिपोर्ट पेश करो।यही घटनाक्रम सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।
सरकार की जवाबदेही जरूरी है
सरकार को पैरोल का विरोध करने का अधिकार है।लेकिन अदालत के आदेश को चुनौती देना और उसे अपनी तरफ से लागू न करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।अगर सरकार को लगता था कि आसाराम बापू को पैरोल नहीं मिलनी चाहिए, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत उस आदेश को चुनौती देनी चाहिए थी।लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया और फिर भी आदेश की पालना नहीं हुई, तो प्रशासन को यह बताना चाहिए कि किस कानूनी आधार पर रिहाई रोकी गई?यही वह सवाल है जिसका जवाब अब राजस्थान सरकार से मांगा जाना चाहिए।
अब असली परीक्षा प्रशासन की है
आसाराम बापू के समर्थकों के लिए यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाईकोर्ट ने केवल पैरोल पर विचार नहीं किया, बल्कि सरकार को पहले से दिए गए आदेश की पालना करने का निर्देश भी दिया है।अब सवाल सीधा है की जब हाईकोर्ट ने 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी, आदेश पर कोई रोक नहीं थी और सरकार ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी नहीं दी, तो आसाराम बापू की रिहाई में इतनी देरी क्यों हुई?राजस्थान सरकार को इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और प्रशासन के पास बड़ी शक्तियां जरूर होती हैं, लेकिन अदालत के आदेश की पालना करना उन्हीं संवैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा है।और जब किसी नागरिक के मामले में अदालत को अपने आदेश की पालना कराने के लिए दोबारा हस्तक्षेप करना पड़े, तो सवाल केवल उस नागरिक का नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है।
संदर्भ: राजस्थान हाईकोर्ट का 3 अगस्त 2026 का आदेश, 6 अक्टूबर 2026 की सुनवाई तथा अमर उजाला, हिन्दुस्तान और द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टें।
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