आसाराम बापू की चेतावनियां और कांग्रेस का राजनीतिक पतन,क्या भाजपा भी उसी रास्ते पर?

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नई दिल्ली।सोशल मीडिया और आसाराम बापू के समर्थकों के बीच एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई ,सोशल मीडिया में एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है जिसमें बताया जा है की अगस्त 2013 में आसाराम बापू की गिरफ्तारी से पहले दिए गए कुछ राजनीतिक बयान चर्चा में रहे एवं मीडिया ने उन्हें विवादित बनाकर प्रस्तुत किया था ।उन्होंने अपने खिलाफ हो रही कार्रवाई के पीछे तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की ओर संकेत किया था और बाद में राजस्थान सरकार को चुनावी नुकसान की चेतावनी भी दी थी।करीब 13 वर्ष बाद इन बयानों और उसके बाद हुए चुनावी घटनाक्रम को लेकर सोशल मीडिया तथा उनके समर्थकों के बीच एक बार फिर चर्चा शुरू हुई है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या 2013 में आसाराम बापू और कांग्रेस नेतृत्व के बीच हुआ राजनीतिक टकराव बाद के चुनावी परिणामों में किसी रूप में दिखाई दिया ।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ओर इशारा

अगस्त 2013 में भोपाल में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आसाराम बापू ने कहा था कि उन्हें बताया गया है कि उनके खिलाफ कार्रवाई “मैडम और उनके सुपुत्र” के इशारे पर हो रही है। समकालीन Times of India, India Today और NDTV की रिपोर्टों ने इसे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी की ओर संकेत के रूप में रिपोर्ट किया था।आसाराम बापू से जब इस बारे में सीधे सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा था कि वह स्वयं किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि उन्हें जो जानकारी मिली है, वही बता रहे हैं। कांग्रेस ने उस समय इन आरोपों को खारिज किया था।इसी दौर में उन्होंने राजनीतिक समर्थन को लेकर भी नाराजगी जताई थी और कहा था कि कोई राजनीतिक पार्टी उनके साथ नहीं है।यह बयान उस समय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं ने उनके समर्थन में बयान दिए थे,जबकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से मामले में सावधानी बरतने के संकेत भी दिए गए थे।

“पप्पू” संबोधन की कहानी

राहुल गांधी को “पप्पू” कहे जाने का इतिहास भी इसी दौर से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल किसने किया, इसे लेकर अलग-अलग दावे हैं।2018 की India Today की एक रिपोर्ट में आसाराम बापू का नाम उन लोगों में शामिल किया गया था, जिनसे 2012-13 के आसपास राहुल गांधी के लिए “पप्पू” संबोधन जोड़ा गया। लेकिन रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस उपनाम का पहला इस्तेमाल किसने किया, यह निश्चित रूप से स्थापित नहीं है।

राजस्थान सरकार को चुनावी चेतावनी

आसाराम बापू का एक और बयान अगस्त 2013 के आखिर में सामने आया।गिरफ्तारी से पहले उन्होंने राजस्थान सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि उन्हें फंसाया गया तो सरकार को आने वाले चुनाव में “भारी कीमत” चुकानी पड़ेगी। Indian Express ने 4 सितंबर 2013 को इस बयान को रिपोर्ट किया था।उस समय राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे।इसके कुछ ही महीने बाद दिसंबर 2013 में राजस्थान विधानसभा चुनाव हुए।चुनावी नतीजों में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ। कांग्रेस 21 सीटों पर रह गई, जबकि भाजपा ने 162 सीटें जीतीं। चुनाव आयोग के आधिकारिक सांख्यिकीय अभिलेखों में 2013 राजस्थान विधानसभा चुनाव उपलब्ध हैं।अशोक गहलोत स्वयं सरदारपुरा विधानसभा सीट से चुनाव जीत गए, लेकिन कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और गहलोत को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।इसके बाद केंद्र में कांग्रेस का प्रदर्शन 2013 के घटनाक्रम के बाद 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस के लिए परिणाम बेहद खराब रहे।

लोकसभा चुनाव कांग्रेस की सीटें

2009 206
2014 44
2019 52
2024 99

2009 में 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2014 में 44 सीटों पर आ गई। 2019 में पार्टी ने 52 सीटें जीतीं और 2024 में उसका आंकड़ा 99 हुआ।इन आंकड़ों से कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन में बड़े उतार-चढ़ाव का पता चलता है ।कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर नेतृत्व, संगठन, सरकार के कामकाज, विपक्षी रणनीति, क्षेत्रीय राजनीति और अन्य अनेक कारकों का भी प्रभाव रहा है।

फिर सवाल क्यों उठता है?

सवाल इसलिए उठता है क्योंकि 2013 में आसाराम बापू ने एक साथ दो राजनीतिक बातें कहीं थीं।पहली, उन्होंने अपने खिलाफ कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर संकेत किया।दूसरी, उन्होंने राजस्थान सरकार को चुनावी नुकसान की चेतावनी दी।इसके कुछ महीनों बाद राजस्थान में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और अगले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में केंद्र में कांग्रेस 44 सीटों तक सिमट गई।क्या यह केवल राजनीतिक घटनाओं का संयोग था?उपलब्ध आंकड़े इसका कोई सीधा उत्तर नहीं देते।लेकिन यही वह बिंदु है जिसे आज आसाराम बापू के समर्थक फिर से राजनीतिक बहस में उठा रहे हैं।

अब भाजपा को लेकर भी उठ रहा है सवाल

यहीं से वर्तमान राजनीतिक बहस एक नए मोड़ पर पहुंचती है।आसाराम बापू के समर्थकों का तर्क है कि 2013 में कांग्रेस और आसाराम बापू के बीच पैदा हुआ राजनीतिक टकराव और उसके बाद सामने आए चुनावी परिणामों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।इसी आधार पर वे भाजपा के वर्तमान रुख को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।उनका कहना है कि आसाराम बापू के देशभर में लंबे समय से रहे व्यापक अनुयायी आधार को देखते हुए भाजपा द्वारा उनसे दूरी बनाए जाने को केवल एक व्यक्ति से दूरी के रूप में नहीं, बल्कि उनके समर्थकों के साथ राजनीतिक संबंधों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।फिर भी राजनीतिक सवाल यह है कि यदि किसी बड़े सामाजिक या धार्मिक प्रभाव वाले समूह के समर्थकों को लगता है कि कोई राजनीतिक दल लगातार उनसे दूरी बना रहा है, तो क्या उसका असर उस दल के प्रति उनके राजनीतिक रुख पर पड़ सकता है? इसका उत्तर किसी एक चुनाव से पहले निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता। मतदाता कई मुद्दों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं।लेकिन यही कारण है कि 2013 का कांग्रेस-आसाराम बापू प्रसंग आज भाजपा के संदर्भ में एक राजनीतिक तुलना के रूप में चर्चा में आ रहा है।सवाल यह नहीं कि भाजपा के साथ भी वही परिणाम निश्चित रूप से दोहराया जाएगा।सवाल यह है कि क्या भाजपा आसाराम बापू और उनके अनुयायियों से दूरी के संभावित राजनीतिक प्रभाव का आकलन कर रही है?और दूसरा सवाल यह है कि यदि समर्थकों का कोई बड़ा वर्ग इस दूरी को राजनीतिक उपेक्षा के रूप में देखता है, तो क्या वह आने वाले चुनावों में अपनी प्रतिक्रिया मतदान के माध्यम से व्यक्त कर सकता है?इन दोनों सवालों का उत्तर अभी राजनीतिक अनुमान के दायरे में है, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।

2013 से आज तक: घटनाओं का क्रम

तथ्यात्मक रूप से घटनाओं का क्रम इस प्रकार दिखाई देता है:आसाराम बापू ने 2013 में कांग्रेस नेतृत्व की ओर संकेत किया।उन्होंने राजस्थान सरकार को चुनावी कीमत चुकाने की चेतावनी दी।कुछ महीनों बाद राजस्थान में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।2014 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई।अब इसी ऐतिहासिक घटनाक्रम को आधार बनाकर उनके समर्थक भाजपा के वर्तमान रुख पर भी सवाल उठा रहे हैं।क्या 2013 केवल एक राजनीतिक संयोग था?
क्या आसाराम बापू के समर्थकों का राजनीतिक प्रभाव वास्तव में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है?
और क्या भाजपा को आसाराम बापू तथा उनके अनुयायियों से दूरी के राजनीतिक प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है?इन सवालों का अंतिम उत्तर चुनावी आंकड़े और मतदाताओं का वास्तविक व्यवहार ही दे सकते हैं।

नोट, यह पोस्ट सोशल मीडिया पर आसाराम बापू के समर्थकों के बीच चर्चा पर तेजी से वायरल हो रही है

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