शैलेन्द्र ने दिखाई युवाओं को नई राह,घर के खाली कमरों में बना डाली मशरूम प्रोडक्शन यूनिट

जबलपुर,जिले के पाटन विकासखण्ड के ग्राम कुशली के कृषक शैलेंद्र रैकवार ने घर से ही मशरूम का उत्पादन कर आधुनिक खेती की नई मिशाल पेश की है। शैलेन्द्र के पास कोई पुश्तैनी जमीन उपलब्ध नहीं थी, जो पारंपरिक खेती के लिए सबसे बड़ी जरूरत मानी जाती है। लेकिन शैलेन्द्र ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए घर के मात्र दो खाली कमरों में ‘मशरूम प्रोडक्शन यूनिट’ स्थापित कर किसानों और युवाओं को नई राह दिखाई है।
तकनीकी नवाचार और प्रबंधन
शैलेंद्र ने मशरूम उत्पादन के लिये वर्टिकल फार्मिंग (खड़ी खेती) की तकनीक अपनाई। उन्होंने कम जगह का अधिकतम उपयोग करने के लिए बांस की लकड़ी के 4-5 मंजिला रैक बनाए, जिससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई। वातावरण को अनुकूल बनाए रखने के लिए उन्होंने कूलर और फॉगर्स का उपयोग किया ताकि तापमान 18 डिग्री सेल्सियश से 25 डिग्री सेल्शियस के बीच रहे। नमी और वेंटिलेशन के सटीक प्रबंधन के कारण मात्र 30 से 45 दिनों में मशरूम की फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
कम लागत और अधिक मुनाफा
इस व्यवसाय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत और अधिक मुनाफा है। शैलेंद्र ने मात्र 30 से 40 हजार रुपये के शुरुआती निवेश के साथ मशरूम प्रोडक्शन यूनिट की शुरुआत की, जिसमें बीज, भूसा और रैक जैसे स्थायी खर्च शामिल थे। अब उनके दो कमरों की यूनिट में लगभग 400 से 500 बैग रखे जाते हैं, जिनसे औसतन 800 से 1000 किलो मशरूम का उत्पादन प्राप्त होता है।बाजार की दृष्टि से भी यह मॉडल बेहद सफल है, क्योंकि स्थानीय होटलों, ढाबों और सब्जी मंडियों में इसकी भारी मांग रहती है। इसके अतिरिक्त, यदि ताजा मशरूम की बिक्री नहीं हो पाती, तो उसे सुखाकर पाउडर या अचार बनाकर भी बेचा जा सकता है, जिससे आय की निरंतरता बनी रहती है। प्रति बैच परिचालन लागत मात्र 5 हजार से 7 हजार रुपये के आसपास आती है, जो इसे छोटे किसानों के लिए एक बेहतरीन स्टार्टअप बनाता है।कृषि विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में तैयार यह मॉडल जिले के ऐसे युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है, परंपरागत खेती के स्थान पर आधुनिक कृषि को अपनाना चाहते हैं। शैलेंद्र और उनकी पत्नी श्रीमती संगीता रैकवार आज न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी यह संदेश दे रहे हैं कि यदि तकनीक और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो खेती के लिए एकड़ में फैली जमीन की अनिवार्यता जरूरी नहीं है। अब उनके इस सफल ‘बिजनेस मॉडल’ को सभी किसानों एवत कृषि अधिकारियों से प्रशंसा भी मिल रही है।
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