तहसीलदार द्वारा पारित 32 नामांतरण आदेशों को कलेक्टर ने किया निरस्त

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जबलपुर, कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह ने कलेक्टर न्यायालय में चल रहे पुनरीक्षण के एक प्रकरण में निर्णय देकर तहसीलदार आधारताल द्वारा पारित आरसी काम्प्लेक्स के नामांतरण आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है तथा राजस्व अभिलेख में पूर्ववत सुधार करने के आदेश दिये हैं। अधिकारों का दुरूपयोग कर बिना परीक्षण किये जल्दबाजी में नामांतरण आदेश पारित करने के इस प्रकरण में कलेक्टर श्री सिंह ने तत्कालीन तहसीलदार आधारताल के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रस्तावित करने के निर्देश भी कलेक्टर कार्यालय की वित्त एवं स्थापना शाखा के प्रभारी अधिकारी को दिए हैं। दरअसल, कलेक्टर न्यायालय ने नामांतरण में की गई गंभीर अनियमितता के मामले सामने आने के बाद न्यायालय तहसीलदार आधारताल में सितंबर 2024 में दर्ज हुए प्रकरणों में पारित नामांतरण आदेशों को पुनरीक्षण में लिया था। इनमें से आर सी काम्प्लेक्स सहित 32 प्रकरणों में पारित नामांतरण के आदेश कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं ।कलेक्टर कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार सतीश कुमार अग्रवाल एवं शिप्रा अग्रवाल द्वारा मौजा जबलपुर स्थित आर सी काम्प्लेक्स के नामांतरण हेतु आवेदन तहसीलदार अधारताल के समक्ष 03 मई 2024 को प्रस्तुत किया गया था। तहसीलदार द्वारा इस आवेदन पर 30 मई 2024 को नामांतरण का आदेश पारित किया था।

परीक्षण में मिली ये खामियां:

नामांतरण आवेदन के साथ 1955 यानी 70 वर्ष पुराने पंजीकृत दस्तावेज लगाए गए थे। तहसीलदार ने पर्याप्त जांच किए बिना ही अंतिम आदेश पारित कर दिया।नामांतरण के लिए प्रस्तुत आवेदन अधूरा था। कई जानकारियां खाली थी और इसमें तारीख भी अंकित नहीं थी।शपथ पत्र 50 रुपये के स्टाम्प पर बिना टिकट के था और गवाह के हस्ताक्षर भी नहीं थे। आवेदन शुल्क जमा करने का ऑनलाइन चालान प्रकरण में संलग्न नहीं था।दशकों पुराने दस्‍तावेजों के आधार पर बिना किसी प्रमाणित सत्‍यापित प्रतिलिपि के, सिर्फ छायाप्रतियों के भरोसे इतना बड़ा फैसला बिना पर्याप्‍त जांच के जल्‍दबाजी में कर दिया गया।आदेशिका में दूसरी पेशी यानी 21 मई 2024 को आदेश पारित करना लिखा था, लेकिन वास्तविक आदेश 30 मई 2024 को जारी हुआ।इतने लम्बे समय बाद अचानक नामांतरण चाहने की वजह क्या थी, इस पर आवेदकों द्वारा कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। तहसीलदार ने भी अपने आदेश में इस बिलंब की कोई विवेचना नहीं की। संभावना है कि पहले भी नामांतरण का प्रयास अस्वीकार हो चुका हो।कलेक्टर ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 (यथासंशोधित 2018) की धारा 50 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए तत्कालीन तहसीलदार अधारताल द्वारा पारित आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है । इस पुनरीक्षण मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान हितबध्‍द पक्षकार के अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष विस्तार से तर्क रखते हुए अपनी भूल स्वीकार की।पक्षकार की ओर से कहा गया कि उन्हें नामांतरण की तकनीकी प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं थी और अधिवक्ता की गलती व अज्ञानता के कारण यह प्रक्रियात्मक त्रुटियां हुई हैं, जिसके लिए उन्होंने क्षमा की मांग की। उन्होंने यह भी दावा किया कि मूल दस्तावेज उनके पास सुरक्षित हैं और वे शासन की किसी भी राशि या स्टांप शुल्क को दोबारा जमा करने के लिए तैयार हैं।कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने और रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद स्पष्ट किया कि पर्याप्त व प्रमाणित दस्तावेजों के बिना तहसीलदार अधारताल द्वारा जल्दबाजी में आदेश पारित करना अपनी अधिकारिता का अविधिपूर्ण प्रयोग है। इसके साथ ही तहसीलदार द्वारा म.प्र. भू-राजस्व संहिता की धारा 110(4) के तहत तय समय सीमा में रिपोर्ट न करने पर लगाया जाने वाला पांच हजार रुपये प्रति प्रकरण का जुर्माना भी नहीं लगाया गया, जिससे ऐसे 32 प्रकरणों में कुल 1 लाख 60 हजार रुपये का अर्थदंड न वसूलने के कारण शासन को वित्तीय क्षति हुई है।कलेक्टर न्यायालय ने तत्कालीन तहसीलदार के अवैध आदेश को निरस्त कर राजस्व अभिलेख को तत्काल पूर्ववत् (पहले जैसा) सुधारने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, नियम विरुद्ध कार्य करने वाले तत्कालीन तहसीलदार अधारताल के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई प्रस्‍तावित करने के निर्देश कलेक्‍टर कार्यालय की वित्त एवं स्थापना शाखा के प्रभारी अधिकारी को दिये हैं।

 

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