न नए कार्य शुरू होंगे, न ही कोई संस्कार, शादियों पर भी रहेगी रोक

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सुग्रीव यादव स्लीमनाबाद : होलिका दहन से आठ दिन पहले लगने वाले होलाष्टक 24 फरवरी से 3 मार्च तक रहेंगे। इन आठ दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, वाहन व मकान की खरीद-बिक्री जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे हैं। हालांकि यह समय देवी-देवताओं की आराधना, जप, तप और दान-पुण्य के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। होलाष्टक फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर शुक्ल पूर्णिमा तक चलता है।पंडित दिलीप पौराणिक ने बताया कि होलाष्टक के दौरान किए गए शुभ कार्य फलदायी नहीं माने जाते, इसलिए इन्हें टालना ही श्रेयस्कर कहा गया है। इस अवधि में विवाह और सगाई जैसे कार्यक्रम स्थगित किए जाते हैं। नया घर, दुकान या व्यवसाय शुरू नहीं किया जाता। वाहन, भूमि, मकान की खरीद से परहेज के अलावा 16 संस्कारों पर भी रोक मानी जाती है। इन पाबंदियों के उलट होलाष्टक का समय आध्यात्मिक उन्नति के लिए विशेष माना गया है। इस अवधि में भगवान शिव, विष्णु और हनुमानजी की पूजा, महामृत्युंजय मंत्र जाप, भगवत भजन और कीर्तन के साथ दान-पुण्य और सेवा कार्य करना श्रेष्ठ है।वही पंडित रमाकांत पौराणिक ने बताया कि होलाष्टक का समय ग्रहों की ऊर्जा को अस्थिर और उग्र मानता है। इस समय ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है, जिससे किसी भी शुभ कार्य में विघ्न उत्पन्न हो सकते हैं। इससे कार्य की सफलता में विघ्न और रुकावटें आ सकती हैं। यही कारण है कि इस दौरान शुभ कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है।होलाष्टक के समय विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार, जनेऊ/धागा संस्कार, गृह शांति, हवन, यज्ञ नया व्यवसाय या नौकरी शुरू करना, जमीन/घर/वाहन खरीदना,मेहंदी, मुंडन और अन्य संस्कार!नई चीजों की खरीदारी, बाल काटना, नाखून काटना,नवविवाहिता के लिए पहली होली ससुराल में न मनाने की परंपरा है!’होलाष्टक’ शब्द होली और अष्टक से मिलकर बना है। अर्थ है-होली से पहले के आठ दिन। इन्हीं दिनों से होली पर्व की तैयारियां जोरों पर होती हैं। पौराणिक प्रसंग के अनुसार दैत्य राज हिरण्यकश्यप ने भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद को इन आठ दिनों तक कठोर यातनाएं दी थीं। अंत में बहन होलिका की गोद में बैठाकर प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया गया। ईश कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। इसी कारण इन आठ दिनों को कष्ट, तप और परीक्षा का समय मानते हुए शुभ कार्यों से बचने की परंपरा व मान्यता है।

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