सिहोरा में चीरघर के हाल बेहाल,मुर्दों को पीएम के दौरान जाती है परेसानी,अस्पताल के सामने डॉक्टरों की खुलीं निजी दुकानें

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जबलपुर /सिहोरा: सिहोरा के सिविल अस्पताल को झांकने तक की किसी भी जिम्मेदार अधिकारी को फुर्सत नहीँ हैं न ही चीरघर के हाल देखने की, सूत्रों की मानें तो अस्पताल में पदस्थ 90 प्रतिशत डॉक्टरों की निजी दुकानें अस्पताल के सामने ही खुली हुईं है ,बताया जा रहा है की निजी दुकानों में  डॉक्टर मरीजों का बढ़िया से इलाज करते हैं, लेकिन यदि सरकारी अस्पताल में ड्यूटी के दौरान कोई मरीज आ जाये तो उसका इलाज उतना अच्छा नहीँ होता जितना इन डॉक्टरों की निजी दुकानों में जाने के बाद होता है।इतना ही नहीँ डॉक्टरों को सरकारी अस्पताल में ड्यूटी के दौरान निजी दुकानों का ज्यादा ध्यान रहता है।कुछ डॉक्टर तो अस्पताल में ड्यूटी के दौरान ही बीच बीच मे अपनी निजी दुकानों के चक्कर लगाते रहते हैं।

किस बात के पैसे देती है सरकार ?

अब ऐसे में सरकार को सोचना चाहिए कि इन डॉक्टरों को 50 हजार से लेकर एक लाख तक की पेमेंट किस बात की दी जाती है ?लोगों का कहना है की जिला कलेक्टर और स्थानीय एसडीएम को सप्ताह में एक दो दिन सरकारी अस्पतालों का निरीक्षण जरूर करना चाहिए ।और देखना चाहिए कि कौन डॉक्टर कितने समय तक ईमानदारी से ड्यूटी करता है ।

चीरघर का चीरहरण 

जिंदा व्यक्ति तो समस्याओं से परेसान रहता है लेकिन यदि कोई दुर्घटना बस मौत का शिकार हो चुका हो तो सिहोरा के चीरघर में पोस्टमार्टम के समय मुर्दे सहित परिजनों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।आपको बता दें की सिविल अस्पताल से लगभग 300 मीटर दूर सब्जी मंडी के पीछे स्थित पोस्टमार्टम (चीर घर) के हाल- बेहाल है।पोस्टमार्टम के लिए बने भवन पूरी तरह छत बिछत हालत में है,लगभग 50 बर्ष पूर्व निर्मित चीरघर जीर्ण-शीर्ण हालात को प्राप्त हो चुका है। वर्षों से 8 वाई 10 की कोठरी में डेड बॉडी का पोस्ट मार्टम होता चला आ रहा है। झोपड़ी नुमा कोठरी में न तो पोस्ट मार्टम करने वाले चिकित्सक के लिए कोई व्यवस्था है ओर न हीं पोस्ट मार्टम कराने आये मृतक के परिजनों के लिए कोई व्यवस्था है। स्थिति तब और भी गड़बड़ा जाती है जब डेड बॉडी सुर्यास्त के बाद पहुंचती है या एक से अधिक बॉडी एक ही दिन अस्पताल पहुंच जाती है।तब परिजनों के लिए रात जागते हुए गुजारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता । पीएम कराने के लिए आने वाले लोगों के बैठने पीने के पानी तक का इंतजाम नहीं है। गर्मी हो या बरसात चीर घर के अंदर एवं बाहर किसी प्रकार की कोई व्यवस्था न होने के कारण पीएम कराने आने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है इस दौरान यदि बारिश शुरू हो जाए तो शव को आने वाले परिजन बाहर भीगते हुए बारिश रुकने का इंतजार करते हैं।

*जर्जर अवस्था में चीर घर कभी भी गिर सकता है

बताया जाता है कि बनने के बाद से इसके देखरेख की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया तभी तो इतनी जर्जर अवस्था में है कि कभी भी गिर सकता है। पूर्व में खिड़की दरवाजे तक चोरी कर लिए गए। लोगों के भारी विरोध के बाद प्रशासन ने खिड़की दरवाजे तो लगा दिये लेकिन अव्यवस्था आज भी हावी है। समय समय पर सिहोरा अस्पताल का तो उन्नयन तो हुआ लेकिन पोस्ट मार्टम घर आज भी बाबा आदम के जमाने की याद दिला रहा है।
*अनेक ग्रामों से आई डेड बॉडी का होता है पीएम*
सिहोरा,खितौला,मझगवां,गोसलपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत घटित दुर्घटना में मृत व्यक्तियों का पी एम सिविल अस्पताल सिहोरा में होता है 30 से 40 कि. मी.दुर से लोग राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलमार्ग की दुर्घटना, सर्पदंश, आत्म हत्या, हत्या में मृत लोगों का पी एम कराने अस्पताल आते हैं लेकिन अव्यवस्था के चलते लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
*सर्व सुविधा युक्त पीएम हाउस का मामला अधर में*
बताया जाता है कि क्षेत्र के लोगों की समस्या को देखते हुए तत्कालीन विधायक के प्रयासों से 2020 में लगभग 4000 वर्ग फुट में सर्व सुविधा युक्त पीएम हाउस बनाए जाने की कवायद तो प्रारंभ हुई जिसमें पी एम कक्ष, चिकित्सक कक्ष,फोरेंसिक विभाग का कक्ष, परिजनों के लिए वेटिंग रुम,फ्रीजर सहित अन्य सुविधाएं से सुसज्जित भवन हेतु चिकित्सा विभाग ने राजस्व विभाग से भूमि आवंटित करने की मांग की किन्तु पहले कारोना फिर विधान सभा चुनाव के चलते मामला अधर में लटक गया।नई सरकार के गठन और विधायक बदलने के बाद राजनीतिक प्रयासों में आई कमी के चलते मामला डण्डें बस्ते को सुशोभित कर रहा है।
इनका कहना है,
प्रतिमाह लगभग आधा सैकड़ा के करीब पीएम के केस आते हैं। असुविधाओं को देखते हुए आधुनिक पोस्टमार्टम हाउस निर्माण हेतु विभाग सहित राजस्व एवं नगर पालिका को पत्र लिखा जा चुका है।
डॉक्टर सुनील लटियार
प्रभारी सिविल
अस्पताल सिहोरा

 


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