खतरे में खोजी पत्रकारिता ? सुप्रीम कोर्ट पहुँचे 21 मीडिया संस्थान

नई दिल्ली।ऐसा क्या हुआ की 21 मीडिया संस्थानों को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा ? आइये समझते है मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश में खोजी पत्रकारिता और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और इससे जुड़े वर्ष 2025 के नियमों के कई प्रावधानों को चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि इस कानून में पत्रकारिता के लिए विशेष छूट नहीं दिए जाने से खोजी पत्रकारिता, जनहित की खबरों और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
21 बड़े मीडिया संस्थान याचिका में शामिल
DNPA देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है। इनमें द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स इंटरनेट, जी मीडिया, NDTV, नेटवर्क 18, ABP और अन्य मीडिया संस्थान शामिल हैं।एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा। याचिका में मांग की गई है कि डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन कानून के उन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया जाए, जो मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या है मीडिया संस्थानों की सबसे बड़ी चिंता?
मीडिया संस्थानों का तर्क है कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ेगी तो भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और सरकारी कामकाज में गड़बड़ियों की जांच करना मुश्किल हो जाएगा।
ऐसे समझें
वहीं उदाहरण के तौर पर यदि कोई पत्रकार किसी अधिकारी, कारोबारी या प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े दस्तावेज जुटाता है, तो संबंधित व्यक्ति को सूचना या सहमति की प्रक्रिया के माध्यम से इसकी जानकारी मिलने का खतरा हो सकता है।ऐसी स्थिति में सबूत नष्ट करने, गवाहों को प्रभावित करने और खबर रोकने की कोशिशों की आशंका जताई गई है।
गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर भी सवाल
DNPA ने कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर चिंता जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि सरकार को डेटा रखने वाली संस्थाओं से जानकारी मांगने का अधिकार देने वाले प्रावधानों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं।मीडिया संस्थानों को आशंका है कि इससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों और व्हिसलब्लोअर की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता है।
खबर हटाने या बदलने का भी दबाव?
याचिका में व्यक्तिगत डेटा मिटाने और सहमति वापस लेने से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए हैं।मीडिया संस्थानों का तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति को खबर में प्रकाशित उसकी व्यक्तिगत जानकारी हटवाने का अधिकार मिलता है, तो जनहित से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों को हटाने या उनमें बदलाव करने का दबाव बन सकता है।इससे भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट अनियमितताओं और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के कामकाज से जुड़ी खबरें प्रभावित हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि आम नागरिकों के निजता के अधिकार और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है।मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया संस्थानों से यह भी कहा कि वे ऐसे सुरक्षा उपाय सुझाएं, जिनसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनी रहे और आम नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग भी न हो।अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। कानून पर अंतरिम रोक लगाने की मांग पर भी नोटिस जारी किया गया, लेकिन सरकार का पक्ष सुने बिना रोक लगाने से इनकार किया गया।
अब 17 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 17 नवंबर 2026 को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अब केंद्र सरकार का जवाब और आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
बड़ा सवाल यह है कि क्या डिजिटल डेटा की सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता के लिए भी ऐसे नियम लागू होंगे, जिनसे जनहित की खबरों की पड़ताल प्रभावित हो सकती है? या फिर निजता के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच कोई ऐसा रास्ता निकलेगा, जिससे दोनों अधिकार सुरक्षित रह सकें?
फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है।
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