दीपोत्सव पर्व पर जगमगाएंगे घर,अहीरों की नृत्य टोलियां होंगी आकर्षण का केंद्र

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सुग्रीव यादव स्लीमनाबाद– दीपोत्सव पर्व इस बार 5 दिन नही बल्कि 6 दिनों का होगा।शुक्रवार से धनतेरस से दीपोत्सव पर्व का आगाज हो जाएगा।दीपोत्सव पर्व को तैयारियां जारी है।घरो का रंगरोगन अंतिम दौर पर चल रहा है।वही दीपोत्सव पर्व को स्लीमनाबाद तहसील मुख्यालय मैं बाजार भी सज -धजकर तैयार हो गया है।शुक्रवार धनतेरस से खरीददारी के लिए बाजार मे चहल-पहल बढ़ेगी।

मिट्टी क़े दीये ओर बर्तनों की बढ़ी रौनक 

दीपावली पर घरों को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीयों की खरीदारी का अलग ही महत्व है। बाजार में छोटे-बड़े दीयों के साथ मिट्टी की कुल्हडिय़ां, दीपक, पूजा के बर्तन और अन्य पारंपरिक सामान दुकानों पर सजे हुए नजर आने लगे हैं। मिट्टी के बर्तन बेचने वाले दुकानदारों के यहां ग्राहकों की आवाजाही बढऩे लगी है। दीपोत्सव को ध्यान में रखते हुए अब लोगों की भीड़ भी अपनी जरूरत के अनुसार दीये और पूजा में उपयोग होने वाले मिट्टी के सामान खरीदने के लिए बाजारों में आ रहे हैं। दुकानों पर सजे हुए पारंपरिक मिट्टी के दीयों के साथ अलग-अलग आकार और डिजाइन के दीपक भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।

बंदनवार ओर झालरों से सजी दुकाने 

स्लीमनाबाद मुख्य बस्ती व तिराहे पर  दोनो ओर अब दीपावली पर घरों के मुख्य द्वार को सजाने के लिए बंदनवार, रंगीन फूलों की मालाएं, सजावटी झालरें और पूजा से जुड़ा सामान सजे हुए ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हुए है। इन दुकानों पर रंग-बिरंगे सजावटी सामान की कतारें लगी हैं। लोग घरों के दरवाजों और पूजा स्थलों की सजावट के लिए अपनी पसंद का सामान खरीद रहे हैं। बाजार में पारंपरिक सजावट के साथ नए डिजाइन के सजावटी सामान भी दुकानों पर आकर्षक अंदाज में लगाए हुए हैं।

परंपरा से जुड़ा है मिट्टी के दीयों का महत्व

दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। ग्राम छपरा के संतोष प्रजापति ने बताया कि बिजली की सजावट और आधुनिक रोशनी के बीच भी मिट्टी के दीयों का महत्व बना हुआ है। घरों में पूजा के समय दीये जलाने के साथ मुख्य द्वार और आंगन में दीप सजाने की परंपरा के चलते ही दीपोत्सव के दौरान इनकी खरीदारी से पारंपरिक मिट्टी के सामान के बाजार को भी रौनक मिलती है। यही वजह है कि हर साल दीपावली से पहले मिट्टी के दीयों और पारंपरिक बर्तनों का बाजार सजता है,पंडित रमाकांत पौराणिक ने बताया कि  भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।मान्यता है कि धनतेरस के दिन ही आयुर्वेद चिकित्सा पध्दति के जनक के रूप मे भगवान विष्णु धन्वंतरि देव के रूप मे समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।इसलिए धनतेरस को धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है।धन्वंतरि देव जब समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे उस समय उनके हाथ मैं अमृत भरा कलश था।इसी वजह से धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा भी पड़ी।धनतेरस पर्व से ही दीपावली की शुरुआत होती है।कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 6 नवंबर  को सुबह 10:30 बजे से हो रहा है, जो 7 नवंबर शनिवार को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगी।धनतेरस पूजा मुहूर्त शाम 6 बजकर 2 मिनट से शाम 7:57 बजे तक,• प्रदोष काल शाम 5:33 बजे से रात 8:09 बजे तक,अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:48 बजे से दोपहर 12:32 बजे तक ओर अमृत काल रात 10:30 बजे से 12:10 बजे तक है!

धनतेरस पर हस्त नक्षत्र का दुर्लभ संयोग 

पंडित दिलीप पौराणिक ने बताया कि धनतेरस पर इस साल कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो दशकों के बाद निर्माण हो रहा है। इस साल धनतेरस पर लक्ष्मी नारायण योग ओर शुक्रवार क़े स्वामी शुक्र क़े प्रभाव से हस्त नक्षत्र का दुर्लभ संयोग है!इस बार धनतेरस का दिन कई शुभ ग्रहों के संयोग के कारण खास माना जा रहा है! 6 नवंबर को सूर्य, बुध और शुक्र की युति से त्रिग्रही योग, बुधादित्य योग, शुक्रादित्य योग और लक्ष्मी नारायण राजयोग का निर्माण हो रहा है!इसके अलावा शुक्र के तुला राशि में होने से मालव्य राजयोग भी बन रहा है।धनतेरस पर चांदी खरीदना अति शुभ रहेगा।

अहीरों की नृत्य टोलियां रहेंगी आकर्षण का केंद्र

कार्तिक मास की अमावस्या पर दीपावली का पर्व मनाया जाता है।जो इस बार 8 नवंबर रविवार को मनाया जाएगा।रात्रि मै दीपावली पर्व मनाने के बाद अहीरों की टोलियां गांव भ्रमण पर निकलती है जो आकर्षण का केंद्र होती है।
पारंपरिक परिधान से सुसज्जित अहीर दीवाली गीतों की धुन पर जब थिरकते है तो लोग अपने आप नाचने को आतुर हो जाते है।दीपोत्सव पर्व की रात मैं गांव गांव को जगाने अहीरों की टोलियां जाती है।इसके बाद महीनों तक अलग अलग गाँवो मैं दिवारी नृत्य की छठा देखने को मिलती है।

 

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