आज की अभिव्यक्ति,नायक कहाँ गए,और जिम्मेदार कौन? पत्रकार यदुवंशी ननकू यादव

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today’s expression:आज का भारत गर्व, बलिदान और संघर्ष की लंबी परंपरा वाला देश रहा है। राम-सीता की कथाएँ, कृष्ण की नीतियाँ, भगत सिंह-चंद्रशेखर जैसे क्रांतिकारियों की फौलादी इच्छाशक्ति—ये सब हमारे राष्ट्रीय चरित्र के हिस्से रहे हैं। पर सवाल उठता है: क्या वही भारत आज मौजूद है? क्या वही समाज बचा हुआ है जो सत्य, कर्म और त्याग को सर्वोपरि मानता था?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट

आज कहीं न कहीं अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ठंडी छाया है। न केवल आवाज़ उठाने में डर है, बल्कि उन आवाज़ों को दबाने के संस्थागत और सामाजिक तंत्र भी शक्तिशाली बने हुए हैं। पत्रकार जो किसी युग में समाज का आईना हुआ करते थे, अब कई बार चट्टुकरण और हितों के साथ जुड़ते दिखते हैं। ऐसे में पत्रकारिता की आत्मा कमजोर पड़ती है और लोकतंत्र की चौथी ईंट ढीली पड़ने लगती है।

नायकों और क्रांतिकारियों की परख

भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों ने जिस तरह अपने जीवन की आहुति दी, वे केवल इतिहास के पात्र नहीं रहे—वे नैतिकता और असंभव के विरुद्ध खड़े होने का चरित्र रहे। आज का नायक शायद अलग है: वह टिकट की राजनीति, लाभ की सोच और क्षणिक लोकप्रियता में फंसा नजर आता है। समाजसेवक, शिक्षक, और आम नागरिक की परख भी बदल रही है — जहां कभी त्याग और अनुशासन का मान था, अब नज़रों में *स्वार���थ* का प्रभाव साफ दिखता है।

समाज में कर्तव्यपरायणता का संकट

समाज के संस्थागत स्तम्भ—न्यायालय, मीडिया, प्रशासन—पर भरोसा बनाये रखना आवश्यक है। पर जब ये संस्थाएं पारदर्शिता और जवाबदेही खोती हैं, तो जनता का विश्वास टूटता है। राजनीतिक सत्ता और मीडियाई शक्तियों के बीच अस्पष्ट गठजोड़ लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। इससे न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, बल्कि सत्य और नैतिकता की भी बड़ी क्षति होती है।क्या रास्ता बाकी है?यह निराश होने का वक्त नहीं, बल्कि जागने और सक्रिय होने का समय है। कुछ जरूरी कदम इस प्रकार हैं:

पत्रकारिता का पुनर्निर्माण

स्वतंत्र, जवाबदेह और खोजी पत्रकारिता को प्रोत्साहन दें; जनहित की खबरों को प्राथमिकता दें।नागरिक — सक्रिय भागीदारी: लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लें, जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही माँगें और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएँ।

संस्थागत पारदर्शिता

मीडिया, प्रशासन और न्यायपालिका में पारदर्शिता के मानक सख़्त हों; कानूनों का पालन सुनिश्चित करायें।शिक्षा और नैतिकता: स्कूलों और महाविद्यालयों में नागरिक नैतिकता, इतिहास और लोकसुधार की शिक्षा को अहमियत दें।सामाजिक संरचना: समाजसेवियों और स्थानीय संगठनों को सशक्त बनाना होगा ताकि वे Grassroots पर काम कर सकें।अंततः विकल्प की ज़िम्मेदारी हम सब पर है। इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि जब समाज संगठित होता है और नैतिक बहस खुलकर होती है, तब परिवर्तन संभव होता है। अगर हम आज चुप बैठें और केवल विगत नायकों की स्मृति पर निर्भर रहें, तो भविष्य निराशाजनक होगा। असली प्रश्न यह है: हम किस भारत में जीना चाहते हैं — वो देश जो त्याग और सत्य पर टिका हो, या वो जिसमें स्वार्थ और तात्कालिक शक्तियाँ हावी हों?समाप्ति जनता, मीडिया और संस्थाओं के बीच समन्वय और पारदर्शिता से ही हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को पुनर्जीवित कर सकते हैं। शोर और दलाली के बीच भी साहसिक, सत्यवादी और समर्पित आवाजें उभरेंगी। तभी हम कह सकेंगे कि यह वही धरती है जिसकी परंपराएँ हमें प्रेरित करती हैं — न कि वह जहाँ चट्टुकरण और दुराचार ने जीत हासिल कर ली हो।

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