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शिक्षा का लक्ष्य चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास है करना

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सुग्रीव यादव स्लीमनाबाद – स्वामी विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय स्लीमनाबाद मै आंतरिक गुणवत्ता प्रकोष्ठ के अंतर्गत एवं भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ के तहत चरित्र निर्माण ओर व्यक्तित्व का समग्र विकास विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन प्राचार्या डॉ सरिता पांडेय की अध्यक्षता मै किया गया!उक्त वेबीनार मै पंजाब विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त शोध अधिष्ठाता डॉ सुधीर कुमार आचार्य ओर डॉ बी एन त्रिपाठी विभाग अध्यक्ष मां कुंवर बाई स्वशासी महाविद्यालय जबलपुर के द्वारा चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व समग्र विकास पर प्रकाश डाला गया!कार्यक्रम की शुरुआत माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के साथ किया गया!मुख्य वक्ता डॉ सुधीर कुमार आचार्य ने कहा कि शिक्षा किसी देश की भाषा, सभ्यता, संस्कृति और जीवन आचरण से जुड़ा विषय है। इसका मुख्य अंग चरित्र निर्माण और सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण कर समाज के लिए आदर्श नागरिक तैयार करना है।
उन्होंने बताया कि न्यास द्वारा 16 विषयों पर कार्य किया जा रहा है जिनमें से चरित्र निर्माण एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल है।उन्होंने कहा की ” शिक्षा का स्वरुप ऐसा होना चाहिए जो समाज और संस्कृति से जुड़ा हो। शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यावसायिक दक्षता प्राप्त युवा शक्ति का निर्माण करना नहीं है युवाओं के अंदर चरित्र निर्माण का विकास करते हुए उन्हें एक आदर्श नागरिक के तौर पर समाज के लिए तैयार भी करना होता है।चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व का विकास मूलतः तीन बातों पर केंद्रित है। इन तीन के जरिये शिक्षक, विद्यार्थी और आदर्श समाज की कल्पना को साकार किया जा सकता है ये हैं – सुविधा, सम्बन्ध और समझ। ये तीनों ही चरित्र निर्माण का आधार स्तम्भ है और उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास तभी संभव है।देश की शिक्षा नीति भारतीय परम्पराओं और इतिहास के सही रूप को प्रदर्शित करने का कार्य करेगी।कार्यशाला के दौरान समूह चर्चा और सामूहिक गतिविधि कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। गतिविधि कार्यों के जरिये प्रतिभागियों को विषय की समझ और उससे जुड़े कार्यों से अवगत करने का कार्य किया गया।

व्यक्तित्व विकास और चरित्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका

वही दूसरे वक्ता डॉ बी एन त्रिपाठी ने कहा कि शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास और चरित्र निर्माण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यक्तित्व विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का चरित्र समय के साथ विकसित होता है। हालाँकि यह अधिकतर मामलों में स्वाभाविक रूप से होता है, लेकिन कुछ लक्षणों को बदला जा सकता है। हमारे व्यक्तित्व को आकार देने में बाहरी पहलुओं की अहम भूमिका होती है। जब हम किसी नए व्यक्ति से मिलते हैं, तो ज़्यादातर उनका व्यक्तित्व ही हमारा ध्यान खींचता है। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके विचार, विश्वास को आकार देता है। व्यक्तियों को शिक्षित करना समाज का एक महत्वपूर्ण पहलू है जो ज्ञान और कौशल प्राप्त करने से कहीं आगे जाता है। शिक्षा में चरित्र को आकार देने और व्यक्तित्व को प्रभावित करने की शक्ति है, जो हमारे विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार के अनुभवों, विचारों और मूल्यों से अवगत कराकर, शिक्षा में व्यक्तियों को जिम्मेदार, नैतिक और सर्वांगीण नागरिक बनाने की क्षमता है। इस लेख में, हम यह पता लगाएंगे कि शिक्षा किस प्रकार चरित्र को आकार देती है, व्यक्तित्व को आकार देने में इसकी क्या भूमिका है और यह व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है।चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास के विविध पहलुओं पर भी दोनों ही वक्ताओं ने प्रकाश डाला।प्राचार्य डॉ सरिता पांडे ने दोनों ही वक्ताओं का स्वागत आभासी माध्यम से किया और दोनों ही वक्ताओं को संगोष्ठी में जोड़ने हेतु साधुवाद दिया।महाविद्यालय के सभी शिक्षक सहकर्मी एवं छात्र-छात्राएं सभी इस कार्यक्रम से सब जुड़े और कार्यक्रम को बहुत ही बढ़िया बताया! अतिथि विद्वान गणित के द्वारा दोनों ही वक्ताओं का आभार प्रदर्शन किया गया!उक्त संगोष्ठी को सफल बनाने में महाविद्यालय की तकनीकी टीम डॉ प्रतीक चौबे, डॉ भरत तिवारी,सत्येंद्र सोनी, कमलेश चौधरी,सत्यम हल्दकार एवं डॉ राजेश सिंह,डॉ बालेंद्र सिंह, डॉ अनिल शाक्य, दौलत सिंह,रवि कोरी एवं जन भागीदारी शिक्षकों का भी विशिष्ट योगदान रहा!इस दौरान डॉ शैलेन्द्र जाट, डॉ सपना द्विवेदी, डॉ प्रीति यादव, डॉ भारती यादव,सुश्री प्रज्ञा तिवारी, मनोरमा चौधरी,रानू हल्दकर, रश्मि राजपूत, शाहीन का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ
कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रीत नेगी ने किया।
डॉ किरण खरादी,अंजना पांडे एवं श्रेया मिश्रा भी संगोष्ठी से जुड़े एवं सहयोग प्रदान किया!

 

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