सूखी नहर में उग आई घास,क्या कागजों में हो रही नहर की सफाई ?

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जबलपुर:नहर मेंटीनेंस के लिए सरकार राशि तो देती ही होगी तो फिर मेंटिनेंस की राशि कहाँ जाती है ? क्या नहर मेंटिनेंस के नाम पर विभाग सिर्फ खानापूर्ती करता है ? ये तमाम सवाल उन सैकड़ो किसानों के मन मे है जिनकी खेती नहर पर निर्भर है।नहरों में पानी की जगह झाड़-झंखाड़ और कचरे का साम्राज्य है। शासन द्वारा बजट दिया नहीं गया या आवंटित भारी-भरकम बजट आखिर किसकी जेब में जा रहा है, यह क्षेत्र के किसानों के लिए एक बड़ा अनुत्तरित सवाल बना हुआ है।वहीँ नर्मदा विकास संभाग 4 सिहोरा के अधिकारियों से इस मामले में फोन पर संपर्क किया गया तो उनका कहना था की ये नहर हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आती ।

यह है मामला

मामला नर्मदा घाटी बरगी नहर परियोजना की ‘कुंड वितरिका पिपरिया नहर’ का है जो की आज विभाग की लापरवाही और भ्रष्टाचार की सजीव तस्वीर पेश कर रही है। कागजों पर नहरों की साफ-सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का ‘पवित्र स्नान’ हो जाता है, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि नहरों में पानी की जगह झाड़-झंखाड़ और कचरे का साम्राज्य है। शासन द्वारा बजट दिया नहीं गया या आवंटित भारी-भरकम बजट आखिर किसकी जेब में जा रहा है, यह क्षेत्र के किसानों के लिए एक बड़ा अनुत्तरित सवाल बना हुआ है।

​सिंचाई सीजन सिर पर, पर नहरों में पसरी है बदहाली

नियमों की मानें तो मानसून से पहले विभाग को दो माह का समय मरम्मत के लिए मिलता है,लेकिन जिम्मेदार अधिकारी शायद ‘कुंभकर्णी नींद’ में डूबे रहे। अब जब सिंचाई का सीजन सिर पर है, तब भी विभाग की ओर से कोई सुगबुगाहट नजर नहीं आ रही है। नहरों में जमा मलबे और झाड़ियों को देखकर यह स्पष्ट है कि यदि अभी पानी छोड़ा गया, तो वह ‘टेल’ (अंतिम छोर) तक पहुंचना तो दूर, रास्ते में ही सीपेज और रुकावटों की भेंट चढ़ जाएगा।

14 गांवों के किसानों का फूटा गुस्सा, ‘टेल’ तक पानी पहुंचना नामुमकिन

वहीं जल उपभोक्ता संस्था गांधीग्राम के अंतर्गत आने वाले बम्होरी, धमकी, पिपरिया और देवनगर सहित करीब 14 गांवों के किसानों की चिंताएं सातवें आसमान पर हैं। किसानों का दोटूक कहना है कि नहरें अब जंगल में तब्दील हो चुकी हैं। गंदगी के कारण पानी का प्रवाह बाधित होगा, जिससे अंतिम छोर के किसानों को एक बार फिर पानी की किल्लत झेलनी पड़ेगी। करोड़ों खर्च होने के बावजूद किसान अपनी सूखी फसलों को बचाने के लिए जद्दोजहद करने को मजबूर हैं।

फील्ड से गायब अफसर, सिर्फ दफ्तरों तक सीमित ‘साहब’

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि मोटा वेतन पाने वाले अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलने की जहमत नहीं उठाते। बरसों से जर्जर हो चुकी संपर्क नहरों का हाल देखने कोई भी जिम्मेदार मौके पर नहीं पहुंचता। किसानों में इस उदासीनता को लेकर भारी रोष है। उनका कहना है कि अधिकारियों की इस लापरवाही का खामियाजा गरीब अन्नदाता को अपनी मेहनत की फसल गंवाकर भुगतना पड़ रहा है।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी ‘पिपरिया नहर’, जवाबदेही तय हो

वर्तमान स्थिति में विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जब बजट हर साल आता है, तो नहरें झाड़ियों से क्यों पटी हैं? क्या सफाई सिर्फ कागजी घोड़ों तक सीमित है? गांधीग्राम क्षेत्र के किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। उनकी मांग है कि तत्काल सफाई कार्य शुरू हो और बजट के नाम पर हुई बंदरबांट की उच्च स्तरीय जांच की जाए, ताकि किसानों के हक का पानी उनके खेतों तक पहुंच सके।

 

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