पराली और नरवाई से बनाएं पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्व,बढ़ाएं मिट्टी में कार्बन

जबलपुर। आज पर्यावरण संकट किसी एक देश, राज्य या गांव की समस्या नहीं रह गया है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता वैश्विक तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, भूजल का गिरता स्तर, मिट्टी की घटती गुणवत्ता और जैव विविधता का नुकसान पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं। इन समस्याओं का प्रभाव सीधे कृषि, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ रहा है।वैश्विक स्तर पर कृषि और पर्यावरण के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या हम प्रकृति से संसाधन लेते रहेंगे, या हम कुछ लौटाने का प्रयास भी करेंगे? अपने खेत को संसाधनों का हब बनाइए। यदि आप अपने खेत की 12% जमीन 3:4:5:88 मॉडल को देते हैं, तो खेती की व्यवस्था ऐसी बन जाएगी जिसमें मिट्टी, बीज, पानी, गाय और पूरे साल लगातार आय प्राप्त करते हुए अपने स्वास्थ्य और जीवन को भी सुरक्षित रख सकेंगे।इसका एक व्यावहारिक उत्तर हमारे खेतों में ही मौजूद है। धान की पराली, गेहूं की नरवाई, फसल अवशेष, सूखी पत्तियां और अन्य जैविक पदार्थ, जिन्हें अक्सर बेकार समझकर जला दिया जाता है, वास्तव में मिट्टी की उर्वरता सुधारने और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के महत्वपूर्ण संसाधन हैं। हम पोटाश और डीएपी जैसी रासायनिक खाद खरीदकर खेत में डालते हैं, जबकि खेत में मौजूद इन मुफ्त संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं करते।
फसल अवशेषों से पोटैशियम का पुनर्चक्रण
विशेष रूप से पोटैशियम के पुनर्चक्रण में फसल अवशेषों की महत्वपूर्ण भूमिका है। फसल के पौधे मिट्टी से पोटैशियम ग्रहण करते हैं और उसका एक हिस्सा तनों तथा पत्तियों में रहता है। अवशेषों को खेत में लौटाने पर यह पोटैशियम दोबारा मिट्टी में उपलब्ध हो सकता है।इसका अर्थ यह नहीं है कि पराली से पोटैशियम की नई मात्रा पैदा होती है। बल्कि पहले से फसल में मौजूद पोषक तत्वों को वापस खेत में पहुंचाकर उनके नुकसान को कम किया जा सकता है।किसान नरवाई को काटकर खेत में फैलाएं। उसकी एक फुट ऊंची परत बनाकर उसमें जीवामृत डालते जाएं। तीन महीने में ही खाद तैयार हो सकती है।
मिट्टी में कार्बन बढ़ाना क्यों महत्वपूर्ण है?
वैश्विक पर्यावरण विमर्श में मिट्टी के जैविक कार्बन को विशेष महत्व दिया जाता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। पौधों की जड़ें, जड़ अवशेष और फसल अवशेष मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ पहुंचाते हैं। इनका एक हिस्सा सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित होता है, जबकि कुछ कार्बन अपेक्षाकृत लंबे समय तक मिट्टी में सुरक्षित रह सकता है।यदि किसान लगातार फसल अवशेष जलाने के बजाय उन्हें उचित तरीके से मिट्टी में लौटाएं, हरी खाद का उपयोग करें, फसल चक्र अपनाएं और मिट्टी के कटाव को कम करें, तो मिट्टी में जैविक कार्बन बनाए रखने तथा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।इससे मिट्टी की संरचना और जलधारण क्षमता में सुधार की संभावना रहती है। हालांकि, कार्बन की वास्तविक वृद्धि मिट्टी के प्रकार, जलवायु, जैविक पदार्थों की मात्रा और प्रबंधन पर निर्भर करती है। इसकी पुष्टि समय-समय पर मिट्टी की जांच से की जानी चाहिए।
भारत लाल नामदेव ने समझाया समग्र कृषि मॉडल
प्राकृतिक खेती विशेषज्ञ भारत लाल नामदेव द्वारा विकसित ‘3:4:5:88 समग्र कृषि मॉडल’ का उद्देश्य कृषि को जल संरक्षण, जैविक संसाधनों, उद्यानिकी और बहुफसलीय उत्पादन से जोड़ना है।इस मॉडल में कुल कृषि भूमि के लगभग 12 प्रतिशत हिस्से को संसाधन विकास के लिए नियोजित करने तथा शेष 88 प्रतिशत भूमि पर बहुफसलीय खेती करने की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।
इसके चार प्रमुख घटक हैं
तीन प्रतिशत भूमि पर गोपालन एवं जैविक खाद निर्माण: गोबर, गोमूत्र और फसल अवशेषों के उचित उपयोग से कम्पोस्ट तथा अन्य उपयुक्त जैविक कृषि आदान तैयार किए जा सकते हैं। इससे पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और बाहरी आदानों पर होने वाले खर्च को कम करने में सहायता मिल सकती है।चार प्रतिशत भूमि पर खेत जल बैंक: खेत के सबसे ऊंचे ढाल वाले भाग में बड़ी 80×4×4 फीट की खंती और 20×20×10 फीट का छोटा तालाब बनाया जाता है। खेत के निचले हिस्से से जहां पानी दूसरे खेत में जाता है, वहां 10×4×4 फीट की खंती बनाना होता है। इससे पानी के बेहतर उपयोग और मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।पांच प्रतिशत भूमि पर उद्यानिकी विकास: स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फलदार पौधे, जैसे नींबू, अमरूद, सहजन और अनार, लगाकर किसान अतिरिक्त आमदनी के अवसर विकसित करते हैं।अट्ठासी प्रतिशत भूमि पर मिश्रित खेती: अनाज, दलहन, तिलहन और सब्जियों की उपयुक्त मिश्रित फसल प्रणाली अपनाकर उत्पादन में विविधता लाई जा सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, कृषि जोखिम को कम करने और आय के विभिन्न स्रोत विकसित करने में मदद मिलती है।इस मॉडल का मूल उद्देश्य यह है कि किसान केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि खेत के पानी, मिट्टी, जैविक पदार्थों और उपलब्ध संसाधनों का समन्वित उपयोग करें।इस भूमि-विभाजन को प्रत्येक खेत में अनिवार्य अनुपात के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाए जाने वाले नियोजन मॉडल के रूप में देखना चाहिए।वैश्विक सोच, स्थानीय समाधान पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर नीतियां बनाना आवश्यक है, लेकिन उनके परिणाम स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों से भी जुड़े हैं।जब किसान पराली जलाने के बजाय उसका पुनर्चक्रण करता है, वर्षा जल को खेत में रोकता है, मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों का प्रबंधन करता है और फसल विविधीकरण अपनाता है, तो वह केवल अपनी खेती को बेहतर बनाने का प्रयास नहीं करता, बल्कि व्यापक पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देता है।इसी तरह, गांवों में सामुदायिक भागीदारी से जल संरक्षण, भूमि संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा के प्रयासों को मजबूत किया जा सकता है।
हालांकि, प्राकृतिक खेती की सफलता के लिए स्थानीय परीक्षण, वैज्ञानिक सलाह, बाजार की उपलब्धता और लागत-लाभ का आकलन आवश्यक है। किसी एक मॉडल से सभी किसानों को समान परिणाम मिलने की गारंटी नहीं दी जा सकती।
निष्कर्ष: धरती की सेहत ही भविष्य की खेती का आधार
आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान नरवाई और पराली को बेकार अपशिष्ट मानने के बजाय संभावित कृषि संसाधन के रूप में देखें। इनका उचित प्रबंधन पोटैशियम जैसे पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण, मिट्टी में जैविक पदार्थ बनाए रखने और कृषि लागत घटाने में सहायक हो सकता है।
जय भारती शिक्षा केंद्र (JBSK), जबलपुर के रीजनल काउंसिल की पहल के माध्यम से किसानों तक यह संदेश पहुंचाया जा रहा है कि मिट्टी, पानी और जैविक संसाधनों का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि खेती की आर्थिक मजबूती से भी जुड़ा है।
आज का संकल्प होना चाहिए—नरवाई नहीं जलाएंगे, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण करेंगे, मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने का प्रयास करेंगे और पानी की हर बूंद बचाएंगे।
क्योंकि स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित जल और संतुलित पर्यावरण ही आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की दीर्घकालीन समृद्धि का आधार हैं।
भारत लाल नामदेव
रीजनल काउंसिल
जय भारती शिक्षा केंद्र, जबलपुर
9425466762
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