शरजील को शादी के लिए जमानत,आसाराम बापू को इलाज के लिए क्यों नहीं?

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Why Sharjeel Imam gets bail for marriage, Asaram Bapu not for treatment?

सोशल मीडिया में आसाराम बापू के समर्थकों के बीच नई बहस छिड़ी हुई है समर्थकों का कहना है की एक तरफ शरजील इमाम को चचेरे भाइयों की शादी के लिए सात दिन की अंतरिम जमानत मिल जाती है,तो वहीं  दूसरी तरफ गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लगभग 87 वर्षीय आसाराम बापू के लिए चिकित्सा राहत का लंबा कानूनी संघर्ष।यह तुलना किसी व्यक्ति को निर्दोष या दोषी साबित करने की कोशिश नहीं है। सवाल केवल इतना है कि मानवीय और चिकित्सा आधार पर राहत के मानदंड क्या सभी के लिए समान होने चाहिए?

शरजील इमाम को चचेरे भाइयों की शादी के लिए सात दिन की अंतरिम जमानत

22 सितंबर 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने शरजील इमाम को सात दिन की अंतरिम जमानत दी।उन्हें 4 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 2026 तक अपने दो चचेरे भाइयों की शादी में शामिल होने की अनुमति दी गई है। शादी के कार्यक्रम दिल्ली और बिहार में होने हैं। अदालत ने निर्धारित शर्तों के साथ 10 अक्टूबर की शाम वापस जेल में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।यह नियमित जमानत नहीं, बल्कि पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए दी गई सीमित अवधि की अंतरिम राहत है।मानवीय और पारिवारिक आधार पर ऐसी राहत देना अदालत का अधिकार है और कानून के दायरे में है।लेकिन इसी के साथ आसाराम बापू का मामला भी सामने रखना जरूरी है।

आसाराम बापू: 13 वर्ष से अधिक की हिरासत और गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियां

आसाराम बापू को 2013 में गिरफ्तार किया गया था।अप्रैल 2018 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि होने तक वे लगभग 4 वर्ष 8 महीने तक विचाराधीन आरोपी के रूप में जेल में रहे।इस अवधि में उनकी जमानत याचिकाएं कई बार खारिज हुईं।1 अक्टूबर 2013: पहली जमानत याचिका खारिज हुई।10 फरवरी 2014: दूसरी जमानत याचिका भी खारिज हुई। उस समय राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश में अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लेख करते हुए ट्रायल को तेजी से आगे बढ़ाने की बात कही गई थी।जनवरी 2015: सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी तत्काल जमानत नहीं मिली और महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद दोबारा जमानत मांगने की संभावना पर विचार किया गया।2016: उनकी जमानत याचिका फिर खारिज हुई।इसके बाद 25 अप्रैल 2018 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।इस प्रकार दोषसिद्धि से पहले लगभग 4 वर्ष 8 महीने तक आसाराम बापू विचाराधीन कैदी रहे और उस अवधि में उन्हें नियमित जमानत नहीं मिली।

दोषसिद्धि के बाद भी लंबी न्यायिक प्रक्रिया

2018 में दोषसिद्धि के बाद उनकी अपील न्यायिक प्रक्रिया में रही।यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है।शरजील इमाम और उमर खालिद विचाराधीन आरोपी हैं ।इसलिए दोनों की कानूनी स्थिति समान नहीं है।लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उम्र, स्वास्थ्य, लंबी हिरासत और लंबित अपील जैसे प्रश्न महत्वहीन हो जाते हैं।अगस्त 2026 के राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज किया गया कि आसाराम बापू 13 वर्ष, 1 महीना और 24 दिन की हिरासत पूरी कर चुके थे। उनकी उम्र और इतनी लंबी हिरासत को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें 20 दिन की पहली पैरोल प्रदान की।हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि पहले मिली अंतरिम राहत के दौरान उनके द्वारा जमानत की शर्तों के दुरुपयोग, फरार होने, गवाहों को धमकाने या समाज के लिए खतरा पैदा करने का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया था।लेकिन पैरोल मिलने के बाद भी आसाराम बापू जेल से बाहर नहीं आ सके यह इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला पहलू है।3 अगस्त 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी थी।अदालत के आदेश में साफ कहा गया कि आसाराम बापू को ₹50,000 के निजी मुचलके और ₹25,000-₹25,000 की दो जमानतों पर रिहा किया जाए। पैरोल की अवधि उनकी वास्तविक रिहाई की तारीख से शुरू होनी थी।लेकिन अदालत का आदेश होने के बाद भी उनकी तत्काल रिहाई नहीं हुई।रिपोर्टों के अनुसार जेल प्रशासन ने आदेश का अध्ययन करने और अन्य कानूनी पहलुओं का हवाला दिया। इसके बाद आसाराम बापू की ओर से फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब किया कि अदालत द्वारा पैरोल मंजूर किए जाने के बावजूद आसाराम बापू को जेल से रिहा क्यों नहीं किया गया?यानी सवाल केवल यह नहीं था कि पैरोल मिली या नहीं।सवाल यह भी था कि:जब हाईकोर्ट ने पैरोल मंजूर कर दी थी, तो उस आदेश का वास्तविक लाभ आसाराम बापू को तुरंत क्यों नहीं मिला?एक न्यायिक राहत तभी वास्तविक राहत बनती है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति तक समय पर पहुंचे।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: आसाराम बापू का स्वास्थ्य

2026 में आसाराम बापू की चिकित्सा स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने गंभीर परिस्थितियां रखी गईं।उनकी ओर से अदालत में बार-बार होने वाले रक्तस्राव और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की बात रखी गई।जुलाई 2026 की सुनवाई में उनकी ओर से बताया गया कि उन्हें गंभीर आंतरिक रक्तस्राव हुआ था, उन्हें AIIMS जोधपुर में भर्ती कराया गया और रक्त चढ़ाना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति की वस्तुनिष्ठ जांच के लिए AIIMS मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।AIIMS मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उनकी स्थिति को देखते हुए चौबीसों घंटे चिकित्सा निगरानी और देखभाल की आवश्यकता है।6 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा आधार पर नई अंतरिम जमानत देने से इनकार किया, लेकिन उन्हें अपनी पसंद का प्रशिक्षित देखभालकर्ता 24 घंटे जेल में रखने की अनुमति दी और स्वास्थ्य बिगड़ने की स्थिति में दोबारा अदालत आने की स्वतंत्रता दी।इसलिए तथ्यात्मक रूप से यह कहना सही नहीं होगा कि आसाराम बापू को कभी चिकित्सा आधार पर कोई राहत नहीं मिली। उन्हें पहले भी अंतरिम राहत मिल चुकी है।लेकिन यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि 2026 में गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों के बीच मांगी गई नई चिकित्सा अंतरिम जमानत सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी।

क्या चलना-फिरना बीमारी का खंडन है?

यहीं 2026 की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।आसाराम बापू की चिकित्सा जमानत का विरोध करते हुए राजस्थान सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी हाल की अयोध्या और काशी यात्रा का उल्लेख किया था।राज्य की ओर से यह तर्क रखा गया कि वे कुछ समय पहले अयोध्या और काशी गए थे और वहां चल-फिर रहे थे।यह तर्क उनकी चिकित्सा जमानत के विरोध में रखा गया था।यहां एक बुनियादी सवाल उठता है:क्या किसी बीमार व्यक्ति का कुछ समय चल पाना इस बात का प्रमाण है कि उसे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं नहीं हैं?किसी व्यक्ति का कुछ दूरी तक चलना और उसका पूरी तरह स्वस्थ होना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति को कई गंभीर बीमारियां हों और मेडिकल रिपोर्ट में चौबीसों घंटे निगरानी की आवश्यकता बताई गई हो।चिकित्सा दृष्टि से भी कई परिस्थितियों में मरीज को उसकी क्षमता के अनुसार चलने-फिरने की सलाह दी जाती है। इसलिए केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति चल सकता है, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह गंभीर रूप से बीमार नहीं है।सवाल यह होना चाहिए कि:क्या कुछ समय चलना उसकी पूरी चिकित्सा स्थिति को नकार देता है?या फिर अदालत को व्यक्ति की पूरी मेडिकल स्थिति, उम्र, बीमारी की प्रकृति, रक्तस्राव का इतिहास, आवश्यक निगरानी और चिकित्सकों की राय को एक साथ देखना चाहिए?क्या अदालत इस स्थिति का इंतजार कर रही है कि व्यक्ति पूरी तरह बिस्तर पर पड़ जाए?यही इस पूरे मामले का सबसे गंभीर मानवीय प्रश्न है।अगर किसी बुजुर्ग व्यक्ति को चिकित्सा राहत देने के लिए यह साबित करना जरूरी हो जाए कि वह अब चल भी नहीं सकता, उठ भी नहीं सकता और पूरी तरह बिस्तर पर पड़ चुका है, तो सवाल उठता है:क्या चिकित्सा राहत तब मिलनी चाहिए जब मरीज की स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाए?या फिर राहत पर विचार उस समय किया जाना चाहिए जब चिकित्सा विशेषज्ञ यह बता रहे हों कि व्यक्ति को लगातार निगरानी और विशेष देखभाल की आवश्यकता है?AIIMS मेडिकल बोर्ड ने आसाराम बापू के मामले में अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता नहीं बताई, लेकिन 24 घंटे निगरानी की आवश्यकता बताई थी।इसलिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है:क्या अदालत इस स्थिति का इंतजार कर रही है कि आसाराम बापू पूरी तरह बिस्तर पर पड़ जाएं, तब चिकित्सा जमानत पर विचार किया जाएगा?यह प्रश्न किसी न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए नहीं, बल्कि चिकित्सा राहत के मानवीय उद्देश्य को समझने के लिए है।चिकित्सा राहत का उद्देश्य बीमारी के सबसे अंतिम चरण तक इंतजार करना नहीं होना चाहिए।

रक्त चढ़ाए जाने और गंभीर स्वास्थ्य स्थिति का प्रश्न

आसाराम बापू की ओर से अदालत में यह भी बताया गया कि उन्हें गंभीर आंतरिक रक्तस्राव के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया और रक्त चढ़ाया गया।ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि एक लगभग 87 वर्षीय व्यक्ति, जो 13 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है, उसकी चिकित्सा आवश्यकताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अदालतों द्वारा किस स्तर की मानवीय संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाना चाहिए।यह प्रश्न उनकी दोषसिद्धि को समाप्त करने का प्रश्न नहीं है।यह केवल चिकित्सा राहत का प्रश्न है।अब शरजील इमाम और आसाराम बापू के मामलों को साथ रखकर देखिए

शरजील इमाम

चचेरे भाइयों की शादी में शामिल होने के लिए
7 दिन की अंतरिम जमानत।

आसाराम बापू

13 वर्ष से अधिक की हिरासत।लगभग 87 वर्ष की उम्र।
गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं।बार-बार होने वाले रक्तस्राव की शिकायत।चिकित्सा निगरानी की आवश्यकता।आंतरिक रक्तस्राव के बाद रक्त चढ़ाए जाने की बात अदालत के सामने रखी गई।चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत की मांग।सुप्रीम कोर्ट ने नई चिकित्सा जमानत नहीं दी, हालांकि 24×7 प्रशिक्षित देखभालकर्ता की अनुमति दी।सवाल यह नहीं है कि शरजील इमाम को शादी के लिए राहत क्यों दी गई।परिवार के महत्वपूर्ण अवसर पर मानवीय आधार पर अंतरिम राहत देना अदालत का निर्णय है और कानून के दायरे में है।

असली सवाल यह है:

अगर पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए एक विचाराधीन आरोपी को सात दिन की अंतरिम राहत दी जा सकती है, तो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे एक लगभग 87 वर्षीय व्यक्ति की चिकित्सा राहत पर भी क्या उतनी ही मानवीय संवेदनशीलता से विचार नहीं होना चाहिए?

उमर खालिद का मामला भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है

5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाएं खारिज की थीं।वहीं उसी मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत मिली थी।

इससे यह स्पष्ट होता है कि एक ही व्यापक मामले में अलग-अलग आरोपियों की भूमिका, साक्ष्य और परिस्थितियों के आधार पर अदालत अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकती है।

इसके बाद 18 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग यूएपीए मामले में K.A. Najeeb के सिद्धांत पर विचार करते हुए लंबे समय तक हिरासत और मुकदमे में अत्यधिक देरी की स्थिति में अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया।

यह सिद्धांत यह नहीं कहता कि लंबे समय तक जेल में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतः जमानत का हकदार हो जाता है।लेकिन यह जरूर बताता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक हिरासत संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

आसाराम बापू के मामले में मूल प्रश्न

आसाराम बापू की दोषसिद्धि को केवल लंबी हिरासत के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।लेकिन चिकित्सा राहत एक अलग प्रश्न है।किसी दोषसिद्ध व्यक्ति की उम्र, गंभीर बीमारी, लंबे समय की हिरासत और चिकित्सा आवश्यकताओं को न्यायालय द्वारा राहत पर विचार करते समय ध्यान में रखा जा सकता है।इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि:

“शरजील इमाम को जमानत क्यों दी गई?”

प्रश्न यह है:“क्या मानवीय और चिकित्सा आधार पर राहत के मानदंड सभी व्यक्तियों के लिए समान होने चाहिए?”क्या एक पारिवारिक समारोह के लिए सात दिन की अंतरिम राहत संभव है, तो गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों में एक 87 वर्षीय व्यक्ति के लिए चिकित्सा राहत के प्रश्न पर भी उसी मानवीय दृष्टिकोण से विचार नहीं होना चाहिए?क्या 13 वर्ष से अधिक की हिरासत, बढ़ती उम्र और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं चिकित्सा राहत पर विचार करते समय पर्याप्त महत्व की परिस्थितियां नहीं हैं?और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न:क्या मानवीय आधार पर राहत का मानदंड व्यक्ति देखकर बदलना चाहिए?न्याय केवल सजा निर्धारित करने का नाम नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया में समानता, व्यक्तिगत गरिमा और गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों के प्रति संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण हैं।शरजील इमाम को चचेरे भाइयों की शादी के लिए सात दिन की अंतरिम जमानत मिल सकती है, तो 13 वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद 87 वर्षीय आसाराम बापू की गंभीर चिकित्सा परिस्थितियों में चिकित्सा राहत के प्रश्न पर भी समान मानवीय दृष्टिकोण से विचार क्यों न हो?और यदि किसी व्यक्ति को अपनी बीमारी के बावजूद कुछ समय चलने-फिरने की क्षमता के कारण चिकित्सा राहत से वंचित किया जाता है, तो यह प्रश्न भी पूछा जाना चाहिए:क्या चिकित्सा राहत के लिए मरीज का पूरी तरह बिस्तर पर पड़ जाना आवश्यक है?या फिर बीमारी को उस समय ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए, जब चिकित्सकीय प्रमाण यह बताते हों कि व्यक्ति को निरंतर चिकित्सा देखभाल और निगरानी की आवश्यकता है?और जब राजस्थान हाईकोर्ट स्वयं 20 दिन की पैरोल मंजूर कर चुका था, तो उस न्यायिक राहत का वास्तविक लाभ आसाराम बापू को समय पर क्यों नहीं मिला?यही इस पूरे मामले का मूल प्रश्न है।कानून व्यक्ति देखकर नहीं, समान सिद्धांतों के आधार पर लागू होना चाहिए।

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