क्या है दीक्षा, शब्द का क्या अर्थ ?

 

ज्योतिषचार्य निधिराज त्रिपाठी अनुसार——-* *🌹🌷दीक्षा, शब्द का क्या अर्थ है?🌹🌷* *
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*🌹🌷शिवपुराण के ” वायुसंहिता के 15 वें अध्याय के 5 वें श्लोक में महर्षि उपमन्यु ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि -🌹🌷*

*🌹🌷दीयते येन विज्ञानं क्षीयते पाशबन्धनम्।*
*तस्मात् संस्कार एवायं दीक्षेत्यपि च कथ्यते।।🌹🌷*

*दीक्षा शब्द में दो अक्षर हैं। दी और क्षा।*

*दी अक्षर का अर्थ होता है “देना ” ।*
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अर्थात जिस संस्कार के द्वारा जिस विधि के द्वारा गुरु जी अपने जिज्ञासु शिष्य को आत्मसम्बन्धी ज्ञान तथा परमात्मसम्बन्धी ज्ञान प्रदान करते हैं।

* *🌹🌷क्षा, शब्द का अर्थ होता है नष्ट होना।🌹🌷*
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अर्थात गुरू जी जिस साधन संस्कार के द्वारा अपने जिज्ञासु शिष्य के मोहपाश के बन्धन को नष्ट करते हैं, उस संस्कार साधन को दीक्षा कहते हैं।

अब आप को दीक्षा शब्द के प्रत्येक अक्षर के अर्थ से ज्ञात हो जाना चाहिए कि गुरू जी कितनी साधना सम्पन्न तथा ज्ञानवान, विद्वान होना चाहिए, जो गुरू अपनी साधना से, अपने संयम से नियम से, तथा अपने ज्ञान से, शिष्य का कल्याण करने में समर्थ हो, वही तो गुरू है।

जिस व्यक्ति को शास्त्रों का ज्ञान नहीं होगा, वह किसी को भी धर्म का यथार्थ ज्ञान नहीं करा सकता है। जिस व्यक्ति को शास्त्रों का ज्ञान नहीं होगा, तो वह भगवान के द्वारा कहे गए उनके भक्तों के द्वारा कहे शास्त्रों में भक्ति योग, ज्ञानयोग तथा कर्मयोग का ज्ञान शिष्यों को कहां से प्रदान करेंगे ?

वास्तव में तो शास्त्रज्ञान हीन व्यक्ति के मुख से कभी भी कल्याणकारी सिद्धांत पूर्ण बात नहीं निकल सकती है।

जिस साधुवेषधारी व्यक्ति को तथा ब्राह्मण को स्वयं ही ज्ञान नहीं होगा, उसे तो यही पता नहीं होता है कि कैसे भक्ति करना चाहिए? कैसे जप करना चाहिए? कैसे पवित्रता रखना चाहिए?

*🌹आजकल गुरुपद पर विराजमान अनेक ब्राह्मण तथा अनेक वैष्णव साधु, शास्त्र का ज्ञान न होने के कारण अन्जाने में ही अपने ही संप्रदाय के सिद्धांत का खण्डन करते रहते हैं। जो मन में आया, वही उनके मुख से निकलता रहता है।*

संप्रदाय की वेष्णव दीक्षा तथा शैवदीक्षा आदि लेकर तिलक धारण करते हुए, वेषभूषा धारण करते हुए अपने शिष्यों को शास्त्रविरुद्ध तथा अपने आचार्य परम्परा के विरुद्ध ही बोलते बताते रहते हैं।

*आजकल तो कुछ वैष्णवसाधुओं ने तथा ब्राह्मणों ने तथा कथावाचकों ने तो ऐसा कहना प्रारम्भ कर दिया है कि शास्त्रों को अधिक पढ़ने से अहंकारी हो जाते हैं। बुद्धि भ्रमित हो जाती है। भगवान के प्रति भक्तिभावना नष्ट हो जाती है।*

अब आप सोचिए कि ऐसे बेचारे अबोध ब्राह्मणों को तथा कथावाचकों को तथा साधुवेषधारियों को बुराई करते हुए इतना भी ध्यान नहीं रहता है कि इन सबकी महिमा तथा गुरुता तो शास्त्रों के प्रवचन करने के कारण ही हो रही है ,

और ये मंच में बैठकर अथवा अकेले में भी उन्हीं शास्त्रों की निंदा कर रहे हैं। उन्हीं को पढ़ने को मना कर रहे हैं, जिन शास्त्रों के भाष्य लिखकर इनके आचार्यों ने संप्रदाय की स्थापना की हुई थी ।

ऐसे शास्त्रनिंदक व्यक्ति कैसे तो सम्प्रदाय के अच्छे शिष्य माने जाएं, तथा कैसे अच्छे ब्राह्मण माने जाएं, तथा कैसे अच्छे गुरू माने जाएं ? गुरुपद में विराजमान, महन्तपद में विराजमान, तथा अपने आप को एकसफल कथावाचक माननेवाले व्यक्ति, भला अज्ञानियों की सेना नहीं बना रहे हैं?

अवश्य ही शास्त्रज्ञान हीन ब्राह्मण तथा अज्ञानी कथावाचक तथा साधुवेषधारी महन्तपद पर विराजमान व्यक्ति, ये सब शास्त्रों के विरुद्ध तथा अपने सम्प्रदाय के विरुद्ध ही अज्ञानता के कारण प्रचार करने में लगे हैं।

*शिष्यों को दीक्षा देकर भला ये व्यक्ति, श्रद्धालु मनुष्य को कौन सा ज्ञान देंगे? और उनके मोह का नाश भी कैसे करेंगे?*

*इसलिए उपनिषदों में कहा गया है कि सद्गुरु की खोज करना चाहिए।*

वेदों के ज्ञाता, श्रैत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, तपस्वी, संयमी, नियम धर्मसम्पन्न गुरू के पास हवन की लकड़ी समिधा लेकर उनकी शरण में जाकर अपने आप को समर्पित करे। ऐसे ज्ञान विज्ञान सम्पन्न गुरू से ही दीक्षा ग्रहण करना चाहिए।

*वैष्णवदीक्षा भी लेना हो तो भी वैष्णवसिद्धान्त के मर्मज्ञ, शास्त्रसिद्धांत सम्पन्न गुरू से ही दीक्षा लेना चाहिए।*

जब तक कोई ऐसे गुरू नहीं मिलते हैं, तब तक भगवान के नाम लेते रहिए, और भगवान से प्रार्थना करते रहिए, कि हे प्रभो! मैं तो घोर अज्ञानी मूढ़ मनुष्य हूं , मुझे पता नहीं है कि मेरा कल्याण करनेवाले गुरुदेव कहां मिलेंगे? आप ही कृपा करिए।

*भगवान तो आपकी आतुरता देखकर अपने प्रियभक्त ज्ञानी महापुरुष से मिला देंगे।*

किन्तु कोई शिष्य अपने ही जैसे अज्ञानी व्यक्ति से दीक्षा ग्रहण करके कैसे कल्याण मार्ग को देख पाएगा?

*ध्यान रहे कि श्रेष्ठ पुरुषों की खोज करना पड़ती है, चाहे जब, चाहे जहां, चाहे जैसे तैसे तुरन्त महापुरुष नहीं प्राप्त होते हैं।*

*दीक्षा देने के लिए ,गुरू बनने के लिए आतुर अज्ञानी व्यक्ति , अपने अज्ञानी शिष्यों को अच्छा भोजन, रुकने की व्यवस्था आदि तो दे सकते हैं, लेकिन कल्याणकारी ज्ञान नहीं दे सकते हैं।*

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