धनतेरस के दिन खरीदारी करने का शुभ मुहूर्त,ऐसे करें यम दीपदान

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ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार —- धनतेरस के दिन खरीदारी करने का शुभ मुहूर्त
13 नवंबर को धनतेरस पर खरीदारी के लिए पहला मुहूर्त सुबह 7 से 10 बजे तक है, जबकि, दूसरा मुहूर्त दोपहर 1 से 2.30 बजे तक रहेगा और तीसरा मुहूर्त सायं काल में 5:27 से लेकर 5:59 तक का है।

धनतेरस के दिन यम-दीपदान की पूजन विधि
यमदीपदान प्रदोष काल में करना चाहिए।
इसके लिए आटे का एक बड़ा दीपक लें। गेहूं के आटे से बने दीपक में तमोगुणी ऊर्जा तरंगे एवं आपतत्त्वात्मक तमोगुणी तरंगे (अपमृत्यु के लिए ये तरंगे कारणभूत होती हैं) को शांत करने की क्षमता रखती हैं।
तदुपरान्त स्वच्छ रुई लेकर दो लंबी बत्तियां बना लें। उन्हें दीपक में एक – दूसरे पर आड़ी, इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें।
अब इसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें।
प्रदोष काल में इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली, अक्षत एवं पुष्प से पूजन करें। इसके पश्चात घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी -सी खील अथवा गेहूं से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को रखना है।
दीपक को रखने से पहले प्रज्वलित कर लें और दक्षिण दिशा (दक्षिण दिशा यम तरंगों के लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यम-तरंगें अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं) की ओर देखते हुए चार मुँह के दीपक को खील आदि की ढेरी के ऊपर रख दें।
‘ॐ यमदेवाय नमः ’ कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें ।

भारतीय धर्म ग्रंथों व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष (2020) 13-नवम्बर शुक्रवार, को धनतेरस का पर्व मनाया जायेगा। कहा जाता है कि, इस दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।

धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वंतरि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परंपरा है।

कहीं-कहीं लोक मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि, इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचे में या खेतों में बोते हैं और विशेष कर शास्त्रों के अनुसार प्रमाणित रूप से प्राप्त होता है कि, इस दिन यम-दीपदान करने से मनुष्य के जीवन में आ रही अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा सिर्फ दीपदान कर के की जाती है।

कुछ लोग नरक चतुर्दशी के दिन भी दीपदान करते हैं। इस दिन खरीदारी करने की परंपरा है। स्कंद पुराण के मुताबिक इस दिन ऐसा करने से अकाल मृत्यु का डर खत्म होता है। पूरे साल में धनतेरस और रूप चतुर्दशी को मृत्यु के देवता यमराज की पूजा दीपदान कर के की जाती है। इस दिन शाम को यमराज के लिए घर की दक्षिण दिशा में दीपक जलाया जाता है। माना जाता है कि, ऐसा करने से उस घर में रहने वालों पर यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार के लोगों में अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता।

कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे ।

यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनिश्यति ।।

अर्थात – कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन सायंकाल में घर के बाहर यम-देव के उद्देश्य से दीपक रखने से अपमृत्यु का निवारण होता है और जातक के अंदर अल्प मृत्यु के भय को दूर करता है साथ ही एक सुखी जीवन को जीने का साहस देता है।

पद्मपुराण
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां तु पावके।

यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।

अर्थात – कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को घर से बाहर यमराज के लिए दीपक जला देना चाहिए इससे दूर मृत्यु का नाश होता है।

यम दीपदान मन्त्र
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह |

त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ||

इसका अर्थ है, धनत्रयोदशी पर यह दीप मैं सूर्य पुत्र को अर्थात यम देवता को अर्पित करता हूं । मृत्यु के भय से वे मुझे मुक्त करें और मेरा कल्याण करें ।

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धनतेरस पूजा शुभ मुहूर्त ज्योतिषिय के अनुसार, जिस प्रकार अंग्रेजी कैलेंडर में हर दिन 24 घंटे का होता है, उसी तरह हिंदू पंचांग में हर तिथि 24 घंटे के अनुसार ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं होता। बल्कि कई बार ग्रहों-नक्षत्रों के फेरबदल के कारण तिथियों में बदलाव आता है। ऐसा ही कुछ इस वर्ष दिवाली के पांच दिवसीय पर्व के साथ भी होगा, जब कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 12 नवंबर, गुरुवार को रात्रि 09 बजकर 30 मिनट से होगी, जो अगले दिन 13 नवंबर, शुक्रवार शाम 06 बजकर 01 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए वर्ष 2020 में उदया तिथि में धनतेरस 13 नवंबर को मनाई जाएगी।

12 नवंबर (गुरुवार) को सायंकाल 9.30 बजे त्रयोदशी तिथि का प्रारम्भ व 13 नवम्बर को सांय 21.30 बजे त्रयोदशी तिथि का समापन होगा इस कारण से शुक्रवार को प्रदोष व्यापिनी तिथि में धनतेरस पर्व मानना शुभ रहेगा।

त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 12, 2020 को 21:30 बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त – नवम्बर 13, 2020 को 17:59 बजे

अब बात करते हैं कि धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है। तो, धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त 13 नवम्बर को सायंकाल के समय अमृत मुहूर्त में 5.27 बजे से शुरू होकर 5 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना फलदायी माना जाएगा। इसी वक्त अगर कोई दीपदान करता है तो भी शुभ होगा।

धनतेरस शुभ पूजा मुहूर्त -17:27 से 17:59

इसके साथ ही कृष्ण चतुर्दशी तिथि 13 नवंबर, शुक्रवार शाम 06 बजकर 01 मिनट से प्रारंभ होगी, जो अगले दिन 14 नवंबर, रविवार दोपहर 02 बजकर 20 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली का पर्व उदया तिथि में ही मनाया जाएगा, जिसका अर्थ है कि वर्ष 2020 में नरक चतुर्दशी 14 नवंबर 2020 को ही बड़ी दीवाली के साथ मनाई जाएगी।

यूँ तो दीवाली के दो दिन पहले धनतेरस का त्यौहार पड़ता है। इस पर्व की ख़ास बात ये है कि इस दिन बर्तन ख़रीदने की परंपरा है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला त्यौहार है। धन तेरस को धन त्रयोदशी व धन्वंतरि जंयती के नाम से भी जाना जाता है।

धरतेरस पर ऐसे करें कुबेर कुंजी की स्थापना
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि आज के दिन कुबेर कुंजी की स्थापना करने से धन के देवता कुबेर का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके आशीर्वाद से जीवन में कभी भी धन का अभाव नहीं होता है। वैसे भी धन तेरस के दिन कुबेर देव की आराधना का विधान है।

कुबेर को धन का देवता माना जाता है। भगवान कुबेर पृथ्वी लोक पर मौजूद समस्त संपदा के स्वामी कहे जाते हैं इसलिए घर में कुबेर कुंजी रखने से धन की कमी नहीं होती है। कुबेर कुंजी की स्थापना के नियम इस प्रकार हैं।

किसी शुभ मुहूर्त में कुबेर कुंजी का पूजन करें।

कुबेर कुंजी पर हल्दी, सिंदूर चढ़ाकर माता महालक्ष्मी की आराधना करें।
पूजा के बाद कुबेर कुंजी को अपने गल्ले, पर्स या तिजोरी में रख दें।
भगवान कुबेर की कृपा से कभी आपके धन में कमी नहीं आएगी और कोई ख़तरा नहीं रहेगा।

धनतेरस यम दीप दान विशेष

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन
भगवान धनवन्तरि अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।

दीपावली की रात भी लक्ष्मी माता के सामने साबुत धनिया रखकर पूजा करें। अगले दिन प्रातः साबुत धनिया को गमले में या बाग में बिखेर दें। माना जाता है कि साबुत धनिया से हरा भरा स्वस्थ पौधा निकल आता है तो आर्थिक स्थिति उत्तम होती है।

धनिया का पौधा हरा भरा लेकिन पतला है तो सामान्य आय का संकेत होता है। पीला और बीमार पौधा निकलता है या पौधा नहीं निकलता है तो आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है। अगर सम्भव न हो तो कोइ बर्तन खरिदे। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें।

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में रंगोली बना कर दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

धन तेरस पूजा सामान्य विधि

इस दिन लक्ष्मी-गणेश और धनवंतरी पूजन का भी विशेष महत्व है। धनतरेस पर धनवंतरी और लक्ष्मी गणेश की पूजा करने के लिए-
सबसे पहले एक लकड़ी का पट्टा लें और उस पर स्वास्तिक का निशान बना लें।
इसके बाद इस पर एक तेल का दिया जला कर रख दें
दिये को किसी चीज से ढक दें
दिये के आस पास तीन बार गंगा जल छिड़कें
इसके बाद दीपक पर रोली का तिलक लगाएं और साथ चावल का भी तिलक लगाएं
इसके बाद दीपक में थोड़ी सी मिठाई डालकर मीठे का भोग लगाएं
फिर दीपक में १ रुपया रखें। रुपए चढ़ाकर देवी लक्ष्मी और गणेश जी को अर्पण करें
इसके बाद दीपक को प्रणाम करें और आशीर्वाद लें और परिवार के लोगों से भी आशीर्वाद लेने को कहें।
इसके बाद यह दिया अपने घर के मुख्य द्वार पर रख दें, ध्यान रखे कि दिया दक्षिण दिशा की ओर रखा हो।

यमदीपदान विधि

यमदीपदान विधिमें नित्य पूजाकी थालीमें घिसा हुआ चंदन, पुष्प, हलदी, कुमकुम, अक्षत अर्थात अखंड चावल इत्यादि पूजासामग्री होनी चाहिए । साथ ही आचमनके लिए ताम्रपात्र, पंच-पात्र, आचमनी ये वस्तुएं भी आवश्यक होती हैं । यमदीपदान करनेके लिए हलदी मिलाकर गुंथे हुए गेहूंके आटेसे बने विशेष दीपका उपयोग करते हैं ।

यमदीपदान प्रदोषकाल में करना चाहिए । इसके लिए मिट्टी का एक बड़ा दीपक लें और उसे स्वच्छ जल से धो लें । तदुपरान्त स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियाँ बना लें । उन्हें दीपक में एक-दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियोँ के चार मुँह दिखाई दें । अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें ।
प्रदोषकाल में इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली, अक्षत एवं पुष्प से पुजन करें । उसके पश्चात् घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी-सी खील अथवा गेहूँ से ढेरी बनाकर उसके ऊपर दीपक को रखना है । दीपक को रखने से पहले प्रज्वलित कर लें और दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए चारमुँह के दीपक को खील (लाजा) आदि की ढेरी के ऊपर रख दें –

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति ।।

अर्थात् त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनन्दन यम प्रसन्न हों ।

उक्त मन्त्र के उच्चारण के पश्चात् हाथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए यमदेव को दक्षिण दिशा में नमस्कार करें

धनतेरस पूजा मुहूर्त

धनत्रयोदशी या धनतेरस के दौरान लक्ष्मी पूजा को प्रदोष काल के दौरान किया जाना चाहिए जो कि सूर्यास्त के बाद प्रारम्भ होता है और लगभग २ घण्टे 33 मिनट तक रहता है।

सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 33 की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है. प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ रहता है.

13 नवम्बर सूर्यास्त समय सायं स्थिर लग्न 06:05 से लेकर 08:05 तक वृषभ लग्न रहेगा. मुहुर्त समय में होने के कारण घर-परिवार में स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.

चौघाडिया मुहूर्त:
अमृ्त काल मुहूर्त सायं 05:27 से 06:52 तक

चर सायं 04:36 से लेकर 06:01 तक

उपरोक्त में लाभ समय में पूजन करना लाभों में वृ्द्धि करता है. शुभ काल मुहूर्त की शुभता से धन, स्वास्थय व आयु में शुभता आती है. सबसे अधिक शुभ अमृ्त काल में पूजा करने का होता है.

सांय काल में शुभ महूर्त
प्रदोष काल का समय सायं 06:0 1से रात्रि 08:33 तक रहेगा, स्थिर लग्न वृषभ काल 06:05 pm से 08:05 तक रहेगा.

धनतेरस पर खरीददारी के लिये शुभ मुहूर्त

13 नवंबर शुक्रवार को खरीददारी का शुभ मुहूर्त प्रातः शुभ की चौघड़िया

प्रातः 09:34 से 10:58 तक अमृत काल।

प्रातः 06:45 से 08:09 तक चर की चौघड़िया।

मध्यान्ह 12:23 से 01:47 तक शुभ काल।

सायं 05:49 से 06:13 तक गोधूलि बेला।

रात्रि में 06:05 से 08:05 तक वृषभ स्थिर लग्न खरीदारी करने के लिए अति शुभ मुहूर्त हैं।

जय श्री कृष्ण राधे राधे

नाम: ज्योतिषचार्य निधिराज त्रिपाठी

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देखा जाए तो हर व्यक्ति का जन्म होते ही वह अपने प्रारब्ध के चक्र से बंध जाता है और ज्योतिषशास्त्र द्वारा निर्मित जन्म कुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को प्रकट करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं बारह राशि व नवग्रह द्वारा ही संचालित होती हैं। इन ग्रहों का आपके जीवन पर आने वाले समय में कैसा प्रभाव पड़ेगा इसके बारे में विस्तृत जवाब जानने के लिए अभी आप भी कर्ज़ की समस्या से परेशान हैं, और उससे जुड़ा कोई व्यक्तिगत उपाय, निवारण जानना चाहते हों या इससे जुड़े किसी सवाल का जवाब चाहिए हो तो
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कुबेर कुंजी की स्थापना विधि
कुबेर कुंजी की स्थापना किसी भी शुभ दिन विशेषकर धनतेरस और दीपावली के दिन करनी शुभ होती है।
इसके लिए इस दिन माता लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा के बाद मंदिर, पूजा स्थल, धनकोष या तिजोरी में इस कुंजी को रखना चाहिए।
स्थापना करते वक़्त कुबेर कुंजी को दूध, दही, शहद, घी और गंगा जल से स्नान कराए।
इसके बाद विधिवत तरीके से कुबेर कुंजी की पूजा करें और दक्षिण की ओर मुख करके ‘’ॐ कुबेराय नम:’’ मंत्र का जाप करें।
इस दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अभिमंत्रित और सिद्ध किए बिना यह कुंजी प्रभावी नहीं होगी।

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कुबेर कुंजी की स्थापना हेतु मंत्र
“ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये

“धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥”

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