कूर्म जयंती और भगवान का कूर्म अवतार

 

ज्योतिषचार्य निधिराज त्रिपाठी अनुसार—–भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनहार हैं। उनके ऊपर ही इस सृष्टि के सभी जीवों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी है। धन की देवी माँ लक्ष्मी उनकी अर्धांगिनी हैं। भगवद गीता में वर्णित है कि जब जब धरती पर पाप की अधिकता होगी तब तब पाप के नाश के लिए धरती पर प्रभु अवतार लेंगे।

भगवान विष्णु के दशावतार माने जाते हैं जिनमें से 09 इस धरती पर कालांतर में अवतरित हो चुके हैं। हालांकि अलग-अलग जगहों पर भगवान विष्णु के अवतारों की संख्या अलग-अलग है लेकिन भगवान विष्णु के हर अवतार का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं अवतारों में भगवान विष्णु का एक अवतार कूर्म का भी था यानी कि कछुए का अवतार। अब चूंकि मई के महीने में ही कूर्म जयंती का पर्व है, ऐसे में आज हम आपको इस लेख में भगवान विष्णु के कूर्म अवतार के बारे में सारी जरूरी जानकारी देंगे।

कूर्म जयंती और कूर्म अवतार
हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस साल यानी कि साल 2021 में यह शुभ दिन 26 मई को पड़ रहा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने कच्छप उर्फ कूर्म उर्फ कछुए का अवतार लिया था। आइये जानते हैं भगवान विष्णु द्वारा कछुए के रूप में अवतार लेने से जुड़ी कथा।

मान्यता है कि एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र के किसी बात पर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्हें श्री हीन कर दिया। इंद्र देवता इस बात से बेहद परेशान हुए और इसका उपाय जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का सुझाव दिया।

समुद्र मंथन से अमृत कलश के निकलने की बात सुनकर असुर भी देवताओं के साथ इस कार्य में शामिल हो गए। मंथन के लिए मथानी के तौर पर मंदराचल पर्वत को चुना गया और उसकी नेती के तौर पर नागराज वासुकी को चुना गया। असुरों ने देवताओं के साथ मिल कर मंदराचल पर्वत को उसके नियत स्थान से उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर लेकर चल पड़े। मगर पर्वत के अत्यधिक वजनी होने की वजह से वे उसे ज्यादा दूर नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने ही उस पर्वत को समुद्र तट तक पहुंचाया।

इसके बाद समुद्र मंथन का कार्य शुरू हुआ। मंदराचल पर्वत को समुद्र के मध्य में रखकर नागराज वासुकी के सहारे समुद्र को मथा जाने लगा लेकिन मंथन की वजह से मंदराचल पर्वत समुद्र के अंदर धंसने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु ने एक विशालकाय कछुए का अवतार लिया और फिर मंदराचल पर्वत को उठा कर अपनी पीठ पर रख लिया जिसकी वजह से समुद्र मंथन का कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो सका।

वेद और पुराणों में कूर्म अवतार
अलग-अलग पुराणों में भगवान विष्णु के कूर्म अवतार के बारे में जिक्र हुआ है। जैसे कि लिंग पुराण के अनुसार जब पृथ्वी रसातल में जा रही तब भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर पृथ्वी को नष्ट होने से बचाया था। जबकि पद्म पुराण में बताया गया है कि मंदराचल पर्वत जब समुद्र मंथन के दौरान समुद्र ताल में धंसने लगा तब भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर इसे धंसने से बचाया था। वहीं कूर्म पुराण में बताया गया है कि भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार इसलिए लिए था ताकि साधु-संतों को जीवन के चार लक्ष्यों यानी कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का ज्ञान दे सकें।

नरसिंह और भागवत पुराण में कूर्म अवतार को भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार बताया गया है जबकि कई जगहों पर इसे भगवान विष्णु का दूसरा या तीसरा अवतार होने की भी बात सामने आती है।
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