सितंबर महीने के महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार*

ज्योतिषाचार्य, निधिराज त्रिपाठी;1 सितंबर (बृहस्पतिवार)- ऋषि पंचमी: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में जाना जाता है। आमतौर पर हरतालिका तीज के 2 दिन और गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद ऋषि पंचमी मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार बात करें तो यह अगस्त या सितंबर के महीने में पड़ती है। ऋषि पंचमी कोई त्यौहार नहीं है बल्कि इस दिन महिलाएं सप्त ऋषियों का सम्मान करने के लिए इस दिन का व्रत रखती हैं।

3 सितंबर (शनिवार)- ललिता सप्तमी, महालक्ष्मी व्रत प्रारंभ: महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होता है। यह व्रत लगातार 16 दिनों तक किया जाता है। उत्तर भारत में जिस पूर्णिमांत कैलेंडर का अनुसरण किया जाता है उसके अनुसार यह व्रत आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरा होता है।

4 सितंबर (रविवार)- राधा अष्टमी: राधा अष्टमी भगवान कृष्ण की पत्नी राधा की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। राधा अष्टमी के दिन भक्त व्रत रखते हैं। इसके बाद मध्याह्न काल के दौरान देवी राधा की पूजा की जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अगस्त या सितंबर के महीने में राधा अष्टमी मनाई जाती है।

6 सितम्बर (मंगलवार)- परिवर्तनी एकादशी: एकादशी तिथि का सनातन धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। यह तिथि पूरी तरह से भगवान विष्णु को समर्पित होती है। ऐसे में भगवान विष्णु का आशीर्वाद अपने जीवन में प्राप्त करने के लिए एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

7 सितंबर (बुधवार)- वामन जयंती, भुवनेश्वरी जयंती: भगवान विष्णु के वामन रूप के अवतरण दिवस को वामन जयंती के रूप में मनाया जाता है। वामन जयंती भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। भागवत पुराण के अनुसार कहा जाता है कि भगवान विष्णु के 10 अवतार थे उनमें से पांचवा अवतार वामन रूप था। वामन देव ने भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को अभिजीत मुहूर्त में माता अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र में के रूप में जन्म लिया था।

8 सितम्बर, (गुरुवार)- प्रदोष व्रत (शुक्ल), ओणम: ओणम का त्योहार एक बेहद ही प्रसिद्ध मलयाली त्यौहार है। ओणम का दिन सौर कैलेंडर पर आधारित होता है। यह पर्व भगवान विष्णु के वामन रूप में अवतार लेने और महान सम्राट महाबली के धरती पर पुनरागमन के उपलक्ष्य में बेहद ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार को लेकर ऐसी भी मान्यता है कि ओणम के दिन दैत्य राज महाबली हर एक मलयाली के घर में जाकर अपनी प्रजा से अवश्य मिलते हैं।

9 सितम्बर, (शुक्रवार)- अनंत चतुर्दशी, गणेश विसर्जन: गणेश चतुर्थी विसर्जन यानी कि जिस दिन बाप्पा को घर से विदाई दी जाती है। मुख्य तौर पर बहुत से लोग डेढ़ दिन के बाद गणेश विसर्जन करते हैं, तो बहुत से लोग तीसरे दिन, कुछ लोग पांचवें दिन, तो बहुत से लोग सातवें दिन भी गणेश विसर्जन करते हैं। हालांकि गणेश विसर्जन के लिए सबसे शुभ तिथि अनंत चतुर्दशी की मानी जाती है।

इस दिन भगवान की पूजा के समय हाथ में धागा बांधा जाता है। कहते हैं यह धागा व्यक्ति की हर संकट से रक्षा करता है। गणेश उत्सव का प्रारंभ चतुर्थी तिथि से होता है और इसका समापन चतुर्दशी तिथि के दिन होता है। यानी कि गणेश उत्सव भाद्रपद के महीने में 10 दिनों तक मनाया जाता है और अंत में गणेश विसर्जन के साथ इस त्यौहार का समापन हो जाता है।

10 सितम्बर, (शनिवार)- भाद्रपद पूर्णिमा व्रत, प्रतिपदा श्राद्ध (श्राद्ध आरंभ): भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाता है। यह दिन हमारे दिवंगत पितरों को समर्पित होता है। हालांकि यहां विशेष तौर पर इस बात को समझने की आवश्यकता है कि भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध पक्ष से 1 दिन पहले पड़ती है। हालांकि यह पितृपक्ष का हिस्सा नहीं होती है। आमतौर पर पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध के अगले दिन से आरंभ होता है।

13 सितम्बर, (मंगलवार)- संकष्टी चतुर्थी: संकष्टी चतुर्थी का यह पावन व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन विघ्नहर्ता गणपति के भक्त व्रत करते हैं, पूजा करते हैं, और उनका आशीर्वाद अपने जीवन पर सदैव बना रहने के लिए कामना करते हैं।
14 सितंबर (बुधवार)- महा भरणी: भरणी श्राद्ध को ही भरणी चौथ या भरणी पंचमी के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा बहुत सी जगहों पर इसे महा भरणी के रूप में भी जाना जाता है। भरणी नक्षत्र के स्वामी स्वयं यम देवता हैं जिन्हें मृत्यु का देवता कहा गया है इसलिए पितृपक्ष के समय भरणी नक्षत्र को बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

17 सितम्बर, (शनिवार)- कन्या संक्रांति, महालक्ष्मी व्रत पूर्ण, रोहिणी व्रत: कन्या संक्रांति हिंदू सौर कैलेंडर में छठे महीने की शुरुआत का प्रतीक माना गया है। 1 साल में 12 संक्रांति तिथि पड़ती है और यह सभी संक्रांति तिथियां दान पुण्य के लिए बेहद शुभ मानी गई है। जब सूर्य कन्या राशि में गोचर करता है तो इसे कन्या संक्रांति कहते हैं। कन्या संक्रांति के लिए संक्रांति के बाद 16 घाटियों को शुभ या अशुभ माना जाता है। कन्या संक्रांति को विश्वकर्मा पूजा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

18 सितंबर (रविवार)- जीवितपुत्रिका व्रत: जीवित्पुत्रिका व्रत या जिसे बहुत जगह पर जितिया व्रत भी कहते हैं यह बेहद ही महत्वपूर्ण व्रत होता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की सुरक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। यह व्रत आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर किया जाता है। मुख्य तौर पर भारत के बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, में जीवित्पुत्रिका व्रत या जितिया व्रत किया जाता है। इसके अलावा नेपाल में भी यह व्रत बेहद ही लोकप्रिय है।

21 सितम्बर, (बुधवार)- इंदिरा एकादशी

23 सितम्बर, (शुक्रवार)- प्रदोष व्रत (कृष्ण): प्रदोष व्रत प्रत्येक माह में दो बार किया जाता है। पहला कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में। यह व्रत पूर्ण रूप से भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित होता है और इस व्रत को बेहद ही शुभ फलदाई और पावन माना गया है।

24 सितम्बर, (शनिवार)- मासिक शिव रात्रि: मासिक शिवरात्रि भी प्रत्येक माह में किए जाने वाले व्रतों की श्रेणी में आता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। ऐसे में कहा जा सकता है कि 1 साल में 12 मासिक शिवरात्रि के व्रत और एक महाशिवरात्रि का व्रत किया जाता है और यह सभी व्रत बेहद ही पावन होते हैं।

25 सितम्बर, (रविवार)- अश्विन अमावस्या: आश्विन अमावस्या यानी आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि। यह पितृपक्ष का भी अंतिम दिन होता है और इसे सर्वपितृ अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन अमावस्या के दिन हुआ हो या फिर जिनके मृत्यु की तिथि की जानकारी ना हो उनका भी श्राद्ध आश्विन अमावस्या के दिन किया जा सकता है।

26 सितम्बर, (सोमवार)- शरद नवरात्रि प्रारंभ: हिंदू धर्म में नवरात्रि व्रत का बेहद ही महत्व बताया गया है। नवरात्रि 9 दिनों तक चलने वाला एक बेहद ही पावन पवित्र त्योहार है जो देवी दुर्गा को समर्पित होता है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है नौ रातें। नौ रातों और 10 दिनों की अवधि में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। दसवें दिन विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है।

इस दिन देवी दुर्गा की मूर्तियों और प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। अधिकांश भारतीय राज्यों में नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। हालांकि विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्य कर्नाटक के पश्चिमी हिस्सों में नवरात्रि बेहद ही धूमधाम से मनाई जाती है। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना या घट स्थापना करते हैं। इसका एक निश्चित मुहूर्त होता है। पश्चिम बंगाल में नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है।

*ज्योतिषी, अंकशास्त्री और वास्तु विशेषज्ञ*
**ज्योतिषचार्य निधिराज त्रिपाठी** आपको ग्रह दशा,कुंडली मिलान,भविष्यफल गुण मिलान,,मांगलिक दोष,नवग्रह दोष,ग्रह दोष,पित्र दोष,कालसर्प दोष,वास्तु दोष,प्रॉपर्टी समस्या का उचित मार्गदर्शन के बारे में जानकारी चाहिए तो आप हमें +91-9302409892 पर कॉल करें। *हमारे जीवन का मूल उद्देश्य आपको आपके आनंद रुपी जीवन से जोड़ना है*

शेयर करें: