सनातन धर्म में बृहस्पति का महत्व

 

सनातन धर्म में बृहस्पति का काफी महत्व है। बृहस्पति की पूजा तो होती ही है और इसके साथ-साथ उन्हें भगवान विष्णु के समतुल्य भी माना गया है। भगवान बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र बताए जाते हैं। देवताओं के बीच उन्हें गुरु का दर्जा प्राप्त है यानी बृहस्पति देवताओं के लिए भी पूजनीय हैं। सप्ताह में बृहस्पतिवार का दिन भगवान बृहस्पति को समर्पित है। इस दिन खास तौर से भगवान बृहस्पति की पूजा की जाती है। सभी वृक्षों और पौधों में केले के वृक्ष को भगवान बृहस्पति के रूप में पूजा जाता है। भगवान बृहस्पति को सनातन धर्म में शील और धर्म का अवतार माना जाता है।

**02 – वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति का महत्व**
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को सभी ग्रहों के बीच गुरु का स्थान प्राप्त है। यही वजह है कि बृहस्पति का एक अन्य नाम ‘गुरु’ भी है। सभी बारह राशियों में धनु और मीन राशि पर बृहस्पति का आधिपत्य है। वही 27 नक्षत्रों के बीच गुरु पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के स्वामी माने जाते हैं। गुरु कर्क राशि में उच्च होते हैं और वहीं मकर में यह नीच हो जाते हैं। गुरु किसी भी जातक की कुंडली में ज्ञान, शिक्षा, शिक्षक, संतान, बड़े भाई, धर्म-कर्म इत्यादि के कारक माने जाते हैं।

वैदिक ज्योतिष में शुक्र को भी गुरु की ही तरह एक शुभ ग्रह माना गया है लेकिन शुक्र और गुरु एक दूसरे के प्रति बैर रखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शुक्र दैत्यों के गुरु हैं जबकि बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। सभी नौ ग्रहों में सूर्य, चंद्रमा और मंगल से गुरु दोस्ताना व्यवहार रखते हैं जबकि बुध और शुक्र से इन्हें बैर है।

बृहस्पति सभी नौ ग्रहों के बीच उन ग्रहों में से हैं जिनकी गोचर अवधि काफी लंबी होती है। गुरु एक राशि में लगभग 13 महीने गोचर करते हैं। यही वजह है कि जब गुरु का गोचर होता है तो इसका प्रभाव भी व्यापक होता है। इस 13 महीने के गोचर के दौरान लगभग चार महीने गुरु वक्री अवस्था में रहते हैं।

**03 – कब वक्री हो रहे हैं बृहस्पति?**
साल 2021 में 20 जून को रविवार के दिन बृहस्पति की कुंभ राशि में वक्री चाल शुरू हो जाएगी। इसके बाद वे 14 सितंबर 2021 को दोबारा मार्गी होंगे। इस दौरान वे लगभग तीन महीने वक्री अवस्था में रहेंगे। इसके बाद वे मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे।

आइये अब आपको बताते हैं कि बृहस्पति के वक्री होने से क्या प्रभाव पड़ता है।
वक्री बृहस्पति का प्रभाव
वक्री शब्द अपने आप में काफी नकारात्मक लगता है लेकिन ग्रहों की स्थिति में ऐसा नहीं होता है।

“कोई भी ग्रह वक्री होता है तो आमतौर पर लोग यही सोचते हैं कि यह ग्रह अशुभ फल ही देगा लेकिन ऐसा नहीं होता है। यदि अच्छे भाव का स्वामी होकर गुरु अच्छी स्थिति में है और वह वक्री हो रहा है तो वह आपको अच्छी सफलता देगा। इस दौरान आपके रुके हुए कार्य दोबारा शुरू हो सकते हैं। आपके प्रयास करने की क्षमता बढ़ सकती है। आपको आपके परिश्रम को फल मिलेगा और आपको गुरु जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा। जबकि जिनकी कुंडली में बृहस्पति अशुभ स्थिति में है और अशुभ भावों का स्वामी होकर वक्री होता है तो ऐसे जातकों के कार्यों में रुकावट आती है और धर्म-कर्म के मार्ग से वह व्यक्ति भटकता है।”
इन बातों से साफ है कि वक्री बृहस्पति उन जातकों को नकारात्मक फल देगा जिनकी कुंडली में बृहस्पति नकारात्मक स्थान पर विराजमान है जबकि वैसे जातक जिनकी कुंडली में बृहस्पति शुभ स्थान पर विराजमान हैं उन्हें इस दौरान शुभ फल प्राप्त होगा। ग्रहों के वक्री चाल के दौरान नकारात्मक और सकारात्मक परिणाम की मात्रा अधिक हो जाती है। यानी कि ग्रहों के वक्री चाल के दौरान जातकों को उस ग्रह की कुंडली में स्थिति के अनुसार ज्यादा फल प्राप्त होते हैं, अब वो चाहे सकारात्मक हो या फिर नकारात्मक।

आइये अब आपको बता देते हैं कि गुरु यदि शुभ स्थिति में हो तो जातकों को क्या फल मिलता है।
।। ऊँ सूर्याय नम:।।निधिवन ज्योतिष एवं वास्तु केन्द्र
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