कैसे शुरू हुई लठमार होली की परंपरा ?होली के खूबसूरत रंग

 

*ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार——-रंगों के त्योहार होली के ढेरों खूबसूरत और लुभावने रंग होते हैं**। यहां रंगों का अर्थ है होली कितने विभिन्न और अलग-अलग तरीके से मनाई और खेली जाती है। होली का त्यौहार अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। होली के इन विभिन्न रंगों में से एक है लठमार होली, जिसे बरसाने में बेहद ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष बरसाने में लठमार होली यानी 23 मार्च के दिन मनाई जा रही है। इसके बाद नंदगांव में लठमार होली 24 मार्च बुधवार के दिन मनाई जाएगी। लठमार होली इतनी खूबसूरत और शानदार होती है कि, इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से बरसाना और नंद गांव आते हैं।

**महीनों पहले शुरू कर दी जाती है तैयारी**

होली का यह खूबसूरत त्योहार ब्रज में बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इसकी तैयारी लगभग महीनों पहले शुरू कर दी जाती है। इसके अलावा ताकि रंगों में कोई मिलावट ना हो इसके लिए यहां टेसू के फूलों से रंगों को बनाया जाता है।

इस वर्ष जहाँ बरसाने में लट्ठमार होली आज यानी 23 मार्च को खेली जाएगी वहीं नंद गांव में 24 मार्च को लठमार होली खेली जानी है। इस दौरान बरसाने की गोपियां नंद गांव से आए पुरुषों पर लाठियां बरसा कर लठमार होली खेलती है।

**कैसे शुरू हुई लठमार होली की परंपरा**

लठमार होली के पीछे मान्यता है कि, जब भगवान कृष्ण और राधा रानी को देखने के लिए बरसाने आए थे तब कृष्ण और उनके ग्वाल-बाल राधा रानी और उनकी सखियों के साथ हंसी ठिठोली और छेड़खानी करने लगे। जिस पर राधा रानी और उनके साथियों ने छड़ी लेकर मजाकिया लहजे में कान्हा और उनके ग्वाल बालों के पीछे भागना शुरू किया। माना जाता है कि, तभी से लठमार होली की खूबसूरत परंपरा की शुरुआत हुई जो सालों से यूं ही चलती आ रही है और नंद गांव और बरसाने में उसे आज भी बेहद ही पारंपरिक ढंग से निभाया और मनाया जाता है।

इसी परंपरा को बेहद खूबसूरती से आगे बढ़ाते हुए आज भी नंदगांव के पुरुष बरसाना, यानि कि राधारानी के गांव में लाडली जी के मंदिर में ध्वज फ़हराने की कोशिश करते हैं। ऐसे में इस दौरान महिलाएं खूबसूरत वस्त्रों में सज संवरकर और बेहद ही नटखट और मज़ाकिया अंदाज़ में पुरुषों पर लाठी से वार कर के उन्हें ऐसा करने से रोकने का प्रयास करती हैं।

हाँ लेकिन, पुरुष इस दौरान महिलाओं को लठ मारने से मना नहीं कर सकते हैं लेकिन, महिलाओं का ध्यान भटकाने के लिए और मंदिर तक पहुँचने और वहाँ ध्वज फ़हराने के लिए वो उनपर अबीर-ग़ुलाल डालते हैं। बताया जाता है कि, अगर महिलाओं की लाठी से कोई पुरुष बचकर मंदिर तक पहुँचने में कामयाब हो जाता है तो वो मंदिर में ध्वज फहराता है, लेकिन यदि पुरुष किसी भी हालत में महिलाओं की गिरफ्त में आ जाते हैं तो उन्हें महिलाओं का वस्त्र पहनकर नृत्य करना होता है।

लठमार होली में रंगों के साथ-साथ लाठियों का भी जमकर प्रयोग होता है। लठमार होली के बारे में प्रचलित मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि, इस तरीके से होली खेलने की परंपरा स्वयं प्रभु श्री कृष्ण की नगरी में सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है और इसकी सबसे बड़ी खास बात यह है कि और लठमार होली आज भी पारंपरिक और पुराने ढंग से ही खेली जाती है।

**क्या होती है लठमार होली**

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी/नवमी तिथि को लठमार होली खेली जाती है। इस मौके पर पुरुषों पर महिलाएं मजाकिया अंदाज में लठ (लाठियों) से पिटाई करती हैं और उससे बचने के लिए पुरुष एक ढाल का उपयोग करते हैं।

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