प्रहलाद की सत्य रुपी भक्ति की विजय और असत्य रूपी होलिका का दहन का पर्व है होली

 

पवन यादव :होली भई तब जानिये संसार जलती आग हो … संतो ने और भारतीय संस्कृती में होलिका पर्व को असत्य पर सत्य की जीत का पर्व बताया है कहने का मतलब है की होली तो सत्य की असत्य पर जीत का पर्व है लेकिन लोगों ने इसका अलग ही मतलब निकाल रखा है,आज के इस युग में लोग त्यौहार को शराब और कबाब खाने और हुड़दंग करने मनाते है साथ ही समाज में अशांति फेलाने का काम करते है जिसके  चलते ये पावन त्यौहार बदनाम हो रहे है

शास्त्रों में प्राकृतिक रंगो से होली खेलने का विधान है लेकिन आज के बदलते परिवेश में होली के रंगो का रूप मिलावटी रंगो ने ले लिया जो की लोगों की स्किन के लिए खतरनाक साबित हो रही है लेकिन प्रसासन को  आज तक इन रंगो की जाँच करने की फुर्सत ही नहीँ मिली

होलीका को आग से न जलने का था वरदान

वहीँ  पुराणों में आता है की एक समय पर हिरणकश्यप नाम के राक्षस के आतंक से तीनों लोक भयभीत थे देवता इसके नाम से थ्थराते थे इसी राक्षस की एक रानी के गर्भ से पहलाद नाम के पुत्र ने जन्म लिया जिसको नारद मुनि के सत्संग और दीक्षा ने भगवत भक्ति का रंग लगा दिया था दूसरी तरफ हिरणकश्यप अपने आपको ही भगवान मानकर लोगों से खुद की पूजा करवाने लगा लेकिन पहलाद सिर्फ भगवान विष्णु को ही देव मानता था और अपने पिता के विरोध के बाद भी भगवान की भक्ति जारी रखी जिससे परेसान होकर हिरणकश्यप ने पहलाद को जान से मारने के अनेक प्रयास किये लेकिन हर बार भगवत कृपा से पहलाद बच जाता था उसी समय हिरणकश्यप की बहन होलिका ने बताया की उसको ब्रम्हा जी का बरदान है की उसको अग्नि जला नहीँ सकती ऐसे में पहलाद को मारने के लिए एक अर्थी बनाई गई जिसमे होलिका ने पहलाद को अपनी गोद में बिठाकर फिर अग्नि  लगवाई लेकिन हरी कृपा से उल्टा हो गया पहलाद बच गए और होलिका जल गई तब से असत्य पर सत्य की विजय का ये पर्व मनाया जाने लगा,वहीँ इस त्यौहार को आज भी बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है लोग लकड़ी और कंडे को जमाकर उसके ऊपर होलिका और पहलाद की प्रतिमा रखकर उसमे अग्नि लगाते है ये त्यौहार विगत तीन दिनों तक चलता होलिका दहन के बाद दूसरे दिन धुरेडि और फिर भाई दोज लेकिन रंगो का ये त्यौहार तकरीबन सप्ताह भर चलता है

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