ग्रन्थ और गोविंद के बीच की कड़ी हैं गुरु

 

ज्योतिषाचार्य निधि राज तिर्पाठी:🔸ग्रन्थ-गोविंद🔸। *यह न हों जीवन में तो हम अधूरे हैं, कटे हैं, अलग हैं। ग्रन्थों के माध्यम से गोविंद को जान पाते हैं। ग्रन्थ को जानने के लिये ग्रन्थ की आराधना तो चाहिए किन्तु ग्रन्थ का रहस्य खोलते गुरु हैं।*

* ग्रन्थ और गोविंद के बीच की कड़ी हैं। गुरु l ग्रन्थ और गोविंद का प्रकाशन करते हैं।*

श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रीमद् आदर सूचक नहीं हैं। यह श्रीकिशोरीजी जो भक्ति है, प्रेम है उनका अनुमोदन है।

*जो सत्संग में जायेगा वह जगत में जाग जाएगा। जागे हुए को भागने की जरूरत नहीं है, वह हर जगह आनंद में रहने का अनुभव करने लगेगा।*

जैसे सागर में जल तो बहुत है किन्तु पीने के काम का नहीं है वैसे संसार में सुख लगता तो बहुत है किन्तु होता कुछ नहीं है इसलिए इसे भवसागर कहते हैं।

मंगल आचरण का नाम ही मंगलाचरण है, जो सम्यक् प्रकार से गति दे। चरण केवल लौकिक गति देतें हैं, मंगलाचरण अलौकिक गति देता है।

श्रीकृष्ण को सच्चा नमन करना क्या है? न-म-न इस संसार में न तो पहले अपना कुछ था, न बाद में कुछ रहेगा और जो बीच में दिख रहा है सब माया का है, मेरा कुछ नहीं है।जिस दिन यह बात समझ में आ जायेगी वही श्रीकृष्ण के चरणों में सच्चा नमन होगा।

सबको कथामृत पान करना नहीं आता। कथा में क्या पकड़ना क्या छोड़ना चाहिये। कथा में आत्मतत्त्व, ब्रह्मतत्त्व, सिद्धांत को पकड़ना चाहिए। जगततत्त्व और केवल दृष्टांत ही नहीं पकड़नें चाहिए।

जैसे गाय फटाफट खा लेती है फिर बाद में जुगाली करती है वैसेही पहले कथा कान के माध्यम से सुनकर मानस में भर लो फिर एकांत में इसका रसास्वादन करो, बार-बार इसको जीओ, आनन्द लो।

*हवा सब जगह व्यापक है किन्तु गाड़ी के पहिये के लिये व्यापक हवा काम की नहीं है, उसमें हवा भरने के लिये यंत्र से जोड़ना पड़ेगा। वैसे ही परमात्मा जो व्यापक है उसे हृदय में प्रकट करने के लिये किसी न किसी यंत्र से जुड़ना पड़ेगा और वह यंत्र गुरु हैं। व्यापक परमात्मा गुरु रूपी यंत्र से हृदय में प्रकट होता है।*

*ज्योतिषी, अंकशास्त्री और वास्तु विशेषज्ञ*
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