भारतीय भाषाओं के उन्नयन के साथ हिंदी का विकास संभव है

गिरीश बिल्लोरे जबलपुर: *हिंदी अमिय रसधार*
अमिय रसधार भाषा प्रांजल प्रवासी मोहित कर लेती है। इस भाषा में देशज और विदेशी शब्दों का सम्मिश्रण की भाषा के प्रवाह को विचलित नहीं करता। देशज भाषाएं बोलियां हिंदी का कलेवर मजबूत और उसके सौंदर्य वृद्धि कारक होते हैं। हिंदी का विरोध इन दिनों दक्षिण भारतीय भाषा के बोलने वालों द्वारा किया जा रहा है। जबकि हिंदी 1950 के बात से उपेक्षा का शिकार रही है। यह सब राजनीतिक कारण है जो साहित्य के विरुद्ध जाते हैं। भाषाओं में आपसी विरोध पैदा करना भारत के लिए एक सबसे दुखद पहलू है विघटन के आधार में जाति संप्रदाय और भाषा क्षेत्रवाद का योगदान होता है। जबकि भारत को समझने के लिए हमें हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध करना होगा। कल रात्रि अर्थात 13 सितंबर 2021 को एक सामूहिक चर्चा में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हिंदी भाषा किसी भाषा का विरोध नहीं करती बल्कि हिंदी भाषा का निर्माण ही सभी भाषाओं के सम्मान के लिए किया गया है। आज मुझे व्यवहार राजेंद्र सिंह याद आ रहे हैं आज उनका जन्मदिन है राजभाषा का दर्जा दिलाने उनके योगदान को भुलाना बहुत मुश्किल है। वह जबलपुर से थे और जबलपुर की परिभाषा एक शब्द संस्कारधानी में निहित है। राजभाषा हिंदी अब रोटी की भाषा भी है ऐसी स्थिति में तमिल भाषी स्नेही भाइयों का हिंदी भाषा के विरुद्ध झंडा बरदारी करना केवल राजनीतिक विद्रूपता का परिचायक है। अब हिंदी में इतना साहित्य लिखा जा चुका है कि वह विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित भाषाओं में अपना स्थान नियत कर चुकी है। सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान आज के दौर की जरूरत है। कल रात्रि ट्विटर पर भोजपुरी बोली को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की बात की जा रही थी। 1973 से जारी यह आंदोलन मंथर गति से चल रहा है। मेरा मत यह था कि -” मालवी बुंदेली निमाड़ी बघेली छत्तीसगढ़ी ऐसी कई बोलियां हैं जिसके पास अपने टेक्स्ट उपलब्ध है। इन्हें भी आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए”
किसी एक भाषा को जो वर्तमान में बोली के स्वरूप में है आगे लाना और उसके लिए आंदोलन करना उतना प्रभावी नहीं होगा जितना की समस्त भारतीय भाषाओं को जो छूट गई है उन्हें आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कराने के लिए इस आधार पर प्रयास करना चाहिए। सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहिए कि वर्तमान में नवीन शिक्षा नीति में शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा है और सबसे प्रभावशाली भाषाएं जैसा ऊपर मैंने सूची दी है के हिसाब से उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल कर लेना चाहिए। भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने के आंदोलन का मुख्य आधार है कि मारीशस में जब भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है तो क्यों नहीं भारत में भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता आठवीं अनुसूची में शामिल कर दिया जाए। मांग अपनी जगह ठीक है लेकिन शेष सभी भाषाओं को शैक्षणिक संदर्भ में विशेष रूप से आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की प्रार्थना करनी चाहिए ना की ऐसा कोई मुद्दा बढ़ाना चाहिए ताकि भाषाई विवाद पर कोई राजनीतिक फसाद खड़ा हो जाए हिंदी दिवस पर सभी हिंदी प्रेमियों को शुभकामनाओं सहित भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए जय हिंदी जय हिंदुस्तान का नारा बुलंद करने की जरूरत है।  व्यौहार राजेन्द्र सिंह (14 सितम्बर 1900 – 02 मार्च 1988 जबलपुर) हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे जिन्होने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की दिशा में अतिमहत्वपूर्ण योगदान दिया। फलस्वरूप उनके ५०वें जन्मदिन के दिन ही, अर्थात 14 सितम्बर 1949 को, हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया।

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