कृषकों से नरवाई नहीं जलाने की अपील

जबलपुर, वर्तमान समय में रबी फसलों की कटाई किसानों द्वारा की जा रही है। गेंहू की कटाई अधिकांशत: कम्बाईड हार्वेस्टर द्वारा की जाती है। कृषक भाई कटाई उपरांत बचे हुए गेंहू के डंठलों नरवाई से भूसा न बनाकर जला देते हैं। स्मरणीय है भूसा पशु आहार का एक विकल्प है एकत्रित किया गया भूसा ईंट-भट्टा व अन्य उद्योगों में उपयोग किया जाता है। नरवाई का भूसा 2-3 माह बाद प्राय: दोगुनी दर पर विक्रय होता है। साथ ही कृषकों को यही भूसा आवश्यकता पडऩे पर बढ़ी दरों पर क्रय करना पड़ता है।
नरवाई में आग लगाना कृषि के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हानिकारक है। इसके कारण विगत वर्षों में गंभीर स्वरूप की अग्नि दुर्घटनाएं घटित हुई हैं तथा व्यापक संपत्ति की हानि हुई है। ग्रीष्म ऋतु में बढ़ते जल संकट में इससे बढ़ोत्तरी तो होती ही है साथ ही कानून व्यवस्था के लिए विपरीत परिस्थितियां निर्मित होती हैं।
नरवाई जलाने से खेत की आग के अनियंत्रित होने पर जन, धन, संपत्ति, प्राकृतिक वनस्पति एवं जीव जंतु आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे व्यापक नुकसान होता है। खेत की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु इससे नष्ट होते हैं। जिससे खेत की उर्वरा शक्ति शनै:-शनै: घट रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। खेत में पड़ा कचरा भूसा डंठल सडऩे के बाद भूमि को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाते हैं। जिन्हें जलाकर नष्ट करना ऊर्जा को नष्ट करना है। आग लगाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
इस परिस्थितियों में जन सामान्य के हित सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर्यावरण की हानि रोकने एवं लोक व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक कम्बाईन्ड हार्वेस्टर के साथ भूसा तैयार करने हेतु स्ट्रा रीपर अनिवार्य रूप से रखा जायेगा। साथ ही नरवाई को आग लगने की परंपरा कृषक पूर्ण रूप से बंद करें एवं इस प्रकार की कार्यवाही करने वालों को जनहित में हतोत्साहित किया जाये।

शेयर करें: