700 दुश्मनों से अकेला भिड़ गया था ये जवान जानिए पहले परमवीर चक्र विजेता की कहानी

0

पहला परमवीर चक्र पाने वाला ये फौजी जो 700 दुश्मनों से अकेले भिड़ गया था मीडिया रिपोर्ट की मानें तो सोमनाथ शर्मा के ये आखिरी शब्द थे, जिनका नाम सुनकर आज भी हर कोई जोश से लबालब हो जाता है। देश का वो शूरवीर जिसका नाम भारत के इतिहास में उनके कारनामे के लिए लिखा गया, जिनका नाम जोश और कुर्बानी का पर्याय बन गया। देश का पहला परमवीर चक्र पाने वाले मेजर सोमनाथ शर्मा कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी में कमांडर के पद पर तैनात थे।

विरासत में मिले देश सेवा के गुण

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के एक छोटे से गांव डाढ़ में मेजर जनरल एएन शर्मा के घर 31 जनवरी 1923 को जन्मे मेजर सोमनाथ की शुरूआती पढ़ाई गांव में हुई फिर नैनीताल के शैखुंड कॉलेज से हुई। परिवार में बचपन से ही देश सेवा और सैन्य पृष्ठभूमि का माहौल देखने के कारण वीरता, साहस एवं बलिदान के गुण सोमनाथ को उनकी परवरिश के दौरान ही मिले।

हाथ की टूटी हड्डी और बाजू में प्लास्टर बांधे पहुंच गए थे कश्मीर

सोमनाथ ने जैसे ही अपना कॉलेज पूरा किया उसके तुरंत बाद ही वो प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन का हिस्सा बन गए और सेना में सेवाएं देनी शुरू कर दी। द्वितीय विश्व युद्ध में मेजर सोमनाथ ने मोर्चा संभाला और अपने जोश और जज्बे से हर किसी को चौंकाया।

एक किस्सा है जब सेना की तरफ से 26 अक्टूबर 1947 को मेजर सोमनाथ की कंपनी को कश्मीर जाने के आदेश मिले उस दौरान मेजर के बाएं हाथ की हड्डी टूटी हुई थी और उनके बाजू में प्लास्टर चढ़ा हुआ था, लेकिन आदेश मिलते ही मेजर ने जाने की जिद्द कर ली और अपने साथियों से जाने की पुरजोर अपील की। उनका मानना था कि देश सेवा से आगे कुछ भी नहीं होता है।

जब 700 सैनिकों से लिया अकेले पंगा

मेजर सोमनाथ के नेतृत्व में 100 सैनिकों ने बड़गांव में अपनी चौकी बना रखी थी। इसी दौरान उनकी टुकड़ी पर 700 पाक सैनिकों ने हमला बोल दिया। मेजर सोमनाथ ने मोर्चा संभाला और लगातार 6 घंटे तक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया।

लड़ते-लड़ते ही मौत को लगाया गले

श्रीनगर में युद्ध भूमि से महज 15 किलोमीटर दूर बड़गांव से वो सेना के ऑपरेशन को ऑपरेट कर रहे थे। बाजू पर प्लास्टर चढ़ा होने के बावजूद वो सैनिकों को मैगजीन में गोला बारूद भरते हुए लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। लेकिन युद्ध के दौरान अचानक दुश्मन का एक गोला मेजर सोमनाथ शर्मा के पास रखे बारूद के ढेर में आकर गिरा और 3 नवंबर, 1947 को लड़ते-लड़ते ही मेजर ने मौत को गले लगा लिया।

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

0 0 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
ख़बर चुराते हो अभी पोलखोल दूंगा
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x