पूंजीवादी कलेवर में दम तोड़ती कलम

0

(पत्रकार यदुवंशी ननकू यादव)

पूंजीपतियों, बिल्डरों, शराब सिण्डिकेटों के निवेश ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के मूल तेवर को जमकर प्रभावित किया है। कभी अखबार मालिक के खिलाफ ही लिखने का हौसला रखने वाला पत्र जगत आज विविध भारती के फरमाइशी गीतों की तरह डिमांड पर खबरें बनाता और बेंचता है।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सूचनाओं के सम्प्रेषण की स्वतंत्रता तात्कालीन निजाम की मानवीय एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था को प्रकट करता है, दरअसल विचारों को सहज प्रवाह लोकशाही की भूमि को उर्वरक मुहैया कराता है। देखा जाये समाज के समस्त परिवर्तनों में सूचना सम्प्रेषण ने केन्द्रीय भूमिका निर्वाहित की है। प्रत्येक जन आन्दोलन सूचना सम्प्रेषण की गतिशीलता व प्रमाणिकता का सहोदर रहा है। सूचना सम्प्रेषण की गतिशीलता और प्रमाणिकता का सयुंक्त उपक्रम पत्रकारिता कहलाता है और उत्तरदायित्व पूर्ण सूचना सम्प्रेषण की अनेक अनुषांगिक विधाओं का समुच्चय मीडिया नामक संस्था को स्वरूप प्रदान करता है।

मिशन से प्रोफेशन की तरफ भटकन क्यों और कैसे हो गयी, इसकी लंबी दास्तां है

मिशन से प्रोफेशन की तरफ भटकन क्यों और कैसे हो गयी, इसकी लंबी दास्तां है। समाज के परिवर्तित स्वरूप के साथ ही वर्तमान में पत्रकारिता ने अपने रूप को बदल लिया। वर्तमान में पत्रकारिता के पूंजीवादी कलेवर में ढलने के कारण वह अपने उद्दात आदर्शों से विमुख हो गयी है। कभी सामाजिक परिवर्तन को आधार भूमि प्रदान करने वाली पत्रकारिता आज पूंजी के आंगन में बंदी है।
ध्यातव्य है कि पत्रकार रचनाकार का सहोदर है। वो अक्षर संधान कर सत्य का प्रसव करता है किन्तु पूंजीपति सौदागर होता है, नफे-नुकसान के आधार पर ही विषय वस्तु के संदर्भ में निर्णय करता है। लिहाजा वो अपनी बाजारू महत्व

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

0 0 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
ख़बर चुराते हो अभी पोलखोल दूंगा
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x