पक्के हित व प्रेम का बंधनः रक्षाबन्धन

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हिन्दू सँस्कृति ने रक्षा सूत्र का मनोवैज्ञानिक लाभ कितनी सूक्ष्म खोज की ! रक्षा बन्धन पर बहनभाई को रक्षासूत्र (मौली) बाँधती है। आप कोई शुभ कर्म करते हैं तो ब्राह्मण रक्षासूत्र आपके दायें हाथ में बाँधता है, जिससे आप कोई शुभ काम करने जा रहे हैं तो कहीं अवसाद में न पड़ जायें, कहीं आप अनियंत्रित न हो जायें। रक्षासूत्र से आपका असंतुलन व अवसाद का स्वभाव नियंत्रित होता है, पेट में कृमि भी नहीं बनते। और रक्षासूत्र के साथ शुभ मंत्र और शुभ संकल्प आपको असंतुलित होने से बचाता है।इस बार यह पावन पर्व 15 अगस्त 2019 के दिन है

रक्षाबंधन में कच्चा धागा बाँधते हैं लेकिन यह पक्के प्रेम का और पक्के हित का बंधन है।वर्षभर के यज्ञ-याग करते-करते श्रावणी पूर्णिमा के दिन ऋषि यज्ञ की पूर्णाहुति करते हैं, एक दूसरे के लिए शुभ संकल्प करते हैं। यह रक्षाबंधन महोत्सव बड़ा प्राचीन है।ऋषियों के हम ऋणी हैंऋषियों ने बहुत सूक्ष्मता से विचारा होगा कि मानवीय विकास की सम्भावनाएँ कितनी ऊँची हो सकती हैं और असावधानी रहे तो मानवीय पतन कितना निचले स्तर तक और गहरा हो सकता है। रक्षाबन्धन महोत्सव खोजने वाले उऩ ऋषियों को, वेद भगवान का अमृत पीने वाले, वैदिक रस का प्रचार-प्रसार करने वाले और समाज में वैदिक अमृत की सहज-सुलभ गंगा बहाने वाले ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को मैं प्रणाम करता हूँ। आप भी उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करो जिन्होंने केवल किसी जाति विशेष को नहीं, समस्त भारतवासियों को तो क्या, समस्त विश्वमानव को आत्म-अमृत के कलश सहज प्राप्त हों,*

ऐसा वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया है। हम उन सभी आत्मारामी महापुरुषों को फिर से प्रणाम करते हैं।*

शिष्य भी करते हैं शुभ संकल्प इस पर्व पर बहन भाई के लिए शुभकामना करती है। ऋषि अपने शिष्यों के लिए शुभकामना करते हैं। इसी प्रकार शिष्य भी अपने गुरुवर के लिए शुभकामना करते हैं कि ‘गुरुवर ! आपकी आयु दीर्घ हो, आपका स्वास्थ्य सुदृढ़ हो। गुरुदेव ! हमारे जैसे करोड़ों-करोड़ों को तारने का कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो।’हम गुरुदेव से प्रार्थना करें- ‘बहन की रक्षा भले भाई थोड़ी करले लेकिन गुरुदेव! हमारे मन और बुद्धि की रक्षा तो आप हजारों भाइयों से भी अधिक कर पायेंगे।*

*आप हमारी भावनाओं की, श्रद्धा की भी रक्षा कीजिये।’रक्षाबन्धन पर संतों का आशीर्वाद राखी पूर्णिमा पर ब्राह्मण अपने यजमान को रक्षा का धागा बाँधते हैं लेकिन ब्रह्मज्ञानी गुरु धागे के बिना ही धागा बाँध देते हैं। वे अपनी अमृतवर्षी दृष्टि से, शुभ संकल्पों से ही सुरक्षित कर देते हैं अपने भक्तों को।*

*रक्षाबन्धन में केवल बहनों का ही प्यार नहीं है, ऋषि मुनियों और गुरुओं का भी प्यार तुम्हारे साथ है। आपके जीवन में सच्चे संतों की कृपा पचती जाय। बहन तो भाई को ललाट पर तिलक करती है कि ‘भाई तू सुखी रह ! तू धनवान रहे ! तू यशस्वी रहे….’ लेकिन मैं ऐसा नहीं सह सकता हूँ। आप सुखी रहें लेकिन कब तक ? यशस्वी रहें तो किसका यश ? मैं तो यह कह सकता हूँ कि आपको संतों की कृपा अधिक से अधिक मिलती रहे। संतों का अनुभव आपका अनुभव बनता रहे।सर्व मंगलकारी वैदिक रक्षासूत्र भारतीय संस्कृति में ‘रक्षाबन्धन पर्व’ की बड़ी भारी महिमा है।*

इतिहास साक्षी है कि इसके द्वारा अनगिनत पुण्यात्मा लाभान्वित हुए हैं फिर चाहे वह वीर योद्धा अभिमन्यु हो या स्वयं देवराज इन्द्र हो। इस पर्व ने अपना एक क्रांतिकारी इतिहास रचा है।*

वैदिक रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है। यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद् भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है।सौजन्य www. ashramorg.com

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ख़बर चुराते हो अभी पोलखोल दूंगा
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