धर्म का साक्षात् विग्रह : श्रीरामजी

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मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला ।

मोह माने क्या ? उलटा ज्ञान – जो हम नहीं हैं उसको हम मैं मानते हैं और जो हम हैं उसका पता नहीं ।
रावण क्या है ? मोह का स्वरूप है और विष्णु क्या हैं ? जो सबमें बस रहे हैं और सबका हित चाहनेवाले, अकारण दया, करुणा-वरुणा बरसानेवाले हैं, वे हैं भगवान नारायण, भगवान विष्णु; जो कि सृष्टिकर्ता, भर्ता, भोक्ता हैं ।

🌹अकारण दया बरसानेवाले, दीनदयालु होते हुए भी उनको सृष्टि करनी है । अब सब पर दया करते रहेंगे तो सृष्टि कैसे चलेगी ? इसीलिए एक संविधान बनाया कि जो उनकी दया की आकांक्षा करते हैं, उनकी प्रार्थना-पूजा करते हैं उनको तो वे अंतर्प्रेरणा दें अथवा बाहर से अवतरित होकर उनकी मदद करें और बाकी जो अपने मोह, अहंकार, काम-क्रोध से भिड़ते हैं, वे भिड़ते-भिड़ते थक जाते हैं । फिर दूसरी-तीसरी योनियों में आते-आते देर-सवेर उनको समझ आती है कि अंतरात्मा में, आत्मा-परमात्मा में गोता मारे बिना सुख नहीं मिलता ।

🌹लोग बोलते हैं कि वस्तुओं के आश्रय बिना सुख नहीं मिलता परंतु सच्चाई तो यह है कि परमात्मा के आश्रय बिना सुख नहीं मिलता । रात को सब कुछ छोड़कर एक परमात्म-आश्रय में जीव डूब जाता है तो नींद का सुख मिलता है । परमात्मा और आपके बीच अज्ञान होता है किंतु सत्संग, दीक्षा-शिक्षा और जप के द्वारा अज्ञान ज्यों-ज्यों क्षीण होता जायेगा, त्यों-त्यों परमात्म-प्रेरणा जीवन में प्रकट होती जायेगी, परमात्म-प्राप्ति निकट हो जायेगी ।
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9302409892
🌹अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः । (गीता : 5.15)
अज्ञान से ज्ञान आवृत्त हो गया है ।
🌹देवताओं ने अंतर्यामी, सबके हृदय में बसनेवाले करुणा-वरुणालय भगवान नारायण से प्रार्थना की : ”प्रभु ! रावण और राक्षस बड़ा दुःख दे रहे हैं । उन्होंने बड़ा तहलका मचा दिया है, बड़ा क्षोभ पैदा कर दिया है ।”

🌹भगवान नारायण ने देवताओं को कहा :

🌹 ”कोई बात नहीं, तुम लोग निश्चिंत हो जाओ । रावण आदि का वध मैं करूँगा ।” फिर वही देवाधिदेव परमेश्वर सत्ता दशरथनंदन होकर रामजी के रूप में आयी – ऐसा वर्णन आता है ।
‘वाल्मीकि रामायण’ में श्रीरामजी को भगवान के रूप में नहीं बल्कि नर रूप में दर्शाया गया है, क्योंकि श्रीरामजी नर तन में थे और नर-मर्यादा में जी रहे थे । सीताजी को रावण ले गया तो ‘हाय सीते ! सीते-सीते !!…’ कहकर रुदन करने लगे । परात्पर भगवान नारायण एक स्त्री के लिए क्यों रोयेंगे ?

🌹रामचंद्रजी नरलीला कर रहे थे । नारायण के अवतार हैं, भले कैसे भी हों, लेकिन नर रूप में एक-दूसरे के प्रति अपना कर्तव्य कैसे निर्वाह करना चाहिए, एक-दूसरे के प्रति कैसा स्नेह, कैसी सहानुभूति होनी चाहिए – इसकी मंगलमय प्रेरणा देनेवाला अवतार है । भगवान श्रीरामजी का जीवन धर्म का साक्षात् विग्रह है ।आप अपनी हर समस्या के समाधान हेतु हम से संपर्क कर सकते हैं l ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी
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भगवान राम का श्रीविग्रह तो अभी नहीं है परंतु उनके आचरण, उनके गुणगान और उनकी तन्मात्राएँ अभी भी विश्व में व्याप रही हैं । लोगों में सज्जनता, स्नेह, धर्मपालन तथा दुःखियों के प्रति आर्तभाव, दयालुता और सुखियों के प्रति प्रसन्नता – इस प्रकार के श्रीरामजी की तन्मात्राओं के सद्गुण अभी भी फैले हुए हैं ।
‘श्रीरामनवमी’ के दिन भगवान राम की स्मृति, भगवान राम के नाम का जप बड़ा पुण्यदायी है और भगवान राम की *कार्यकुशलता, अहा ! … रामजी *करने योग्य कार्यों को तत्परता से करते और जो नहीं करना है* उसको मन से हटा देते, व्यर्थ का चिंतन नहीं करते थे, सारगर्भित बोलते थे । दूसरे को मान देते व आप अमानी हो के उसका मंगल हो ऐसा बोलते थे । किसीका भी अमंगल नहीं चाहते थे ।

🌹आप भी अपने नाते-रिश्तेदार का, किसीका भी अमंगल न चाहो तो आपका हृदय भी मंगलभवन, अमंगलहारी होने लगेगा । यह आप कर सकते हो । आप भगवान राम की नाईं धनुष धारण नहीं कर सकते लेकिन रामजी के गुण तो अपने हृदय में धारण कर सकते हो ।

🌹रामजी हीन शरणागति नहीं लेते थे । कैकेयी ने हीन शरणागति ली तो कितनी बदनाम और दुःख पैदा करनेवाली हुई । भगवान राम छोटे आदमी की बातों में, खुशामदखोरों की बातों में नहीं आते थे । उन लोगों को यथायोग्य प्रसन्न कर देते पर उनकी बातों में नहीं आते थे । अपने विवेक से निर्णय करते, रोम-रोम में रमे हुए राम में समाधिस्थ होते, शांतात्मा होते और कभी-कभी गुरु वसिष्ठजी का मार्गदर्शन लेते थे ।
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दशरथनंदन श्रीराम बड़ों का आदर करते, अपने जैसों से स्नेह से व्यवहार करते और छोटों से दयापूर्ण व्यवहार करते । कोई सौ-सौ गलतियाँ कर लेता किंतु रामजी उसके लिए मन में गाँठ नहीं बाँधते और कोई उनकी भलाई या सहयोग करता तो उसका उपकार नहीं भूलते थे – ऐसे थे मर्यादा पुरुषोत्तम रामजी । रात्रि को सोते समय तथा प्रातःकाल उठकर बिस्तर पर ही आत्मशांति का सुमिरन करते थे, ‘सुख-दुःख देनेवाली परिस्थितियाँ, व्यवहार बदलनेवाला है पर मेरा आत्मा एकरस, अबदल है । मैं उसीके ध्यान में पुष्ट हो रहा हूँ ।’ आप यह कर सकते हैं ।

*🌹आप रात्रि को शयनखंड में जाने पर और सुबह उठते समय ऐसा चिंतन करेंगे तो आपके जीवन में रोज रामनवमी होने लगेगी अर्थात् आपके हृदय में रामजी का प्राकट्य होने लगेगा l


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ख़बर चुराते हो अभी पोलखोल दूंगा
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