जब चार वर्ष के मासूम को कोर्ट ने सुनाई उम्र कैद की सजा इसका क्या था कसूर ?

जिस उम्र में भले बुरे का कोई ज्ञान नहीँ होता उस उम्र में कोर्ट ने चार वर्ष के बच्चे को उम्र कैद की सजा का फरमान सुना दिया ये बात सुनने में वाकई में बेहद अजीब है की कोई कोर्ट आखिर कैसे किसी महज चार साल के बच्चे को उम्र कैद की सजा सुना सकता है. इससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है की आखिर इस बच्चे ने ऐसा क्या गुनाह किया होगा जो इसे कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुना दी है. आज हम आपको इसी मामले के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं. इस चार साल के मासूम पर ऐसे इल्जामात लगे हैं जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए. आईये आपको बताते हैं की आखिर क्या है इस मामले का पूरा सच और क्यूँ इस मासूम को कोर्ट ने दे दी उम्रकैद की सजा.

आपको बता दें की चार साल के मासूम को उम्रकैद की सजा देने का ये मामला असल में मिश्र का है जहाँ एक बच्चे को दंगे का कसूरवार मान उसे कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुना दी थी. बता दें की महज चार साल के मंसूर कुरानी अली नाम के बच्चे को मिश्र के मंदसौर में हुए बीते साल दंगों का गुनेहगार ठहराया है. सुनने में बेहद अजीब लगने वाली ये बात वास्तव में एक कड़वी सच्चाई है, बता दें की मिश्र के कोर्ट ने चार साल के मासूम बच्चे पर दंगा भड़काने और लोगों के हत्या का आरोप भी लगाया है. बता दें की बच्चे पर ऐसे संगीन इल्जाम एक महिला ने लगाए थे जिसके बाद बच्चे को उम्रकैद की सजा सुना दी गयी. इसके अलावा आपको बता दें की जब चार साला के मासूम को उम्रकैद की सजा देने की बात आम लोगों तक पहुंची तो उन्होनें इस बात का विरोध किया और इस केस को फिर से रीओपन करवाया.

बता दें की जब कोर्ट में मंसूर अली के पिता ने फिर से अपने बच्चे के न्याय के लिए अपील किया तो कोर्ट ने उनकी पूरी बात सुनी और बच्चे के केस पर फिर से सुनवाई की. बता दें की जब इस मासूम के केस को फिर से रीओपन किया गया तो तफ्तीस के बाद पता चला की असल में मिश्र के मंदसौर में जो दंगा हुआ था उसमे अन्य 114 लोगों के शामिल होने की बात पता चली. इसके बाद कोर्ट ने बच्चे की रिहाई का फैसला सुनाया और दंगे में संलिप्त अन्य 144 लोगों के गिरफ्तारी का वारंट जारी किया. आपको बता दें की मिश्र में इस चार साल के मासूम को इस सजा के बाद जेल में डाल दिया गया था और अब मासूम ने अपने एक साल की सजा पूरी भी कर ली है.

वाकई में ऐसे कोर्ट और ऐसे कानून का क्या फायदा जहाँ बेगुनाहों को ही कसूरवार मानकर सजा दे दी जाती है और आरोपियों की शिनाख्त तक नहीं की जाती है. हालांकि जब कोर्ट ने इस बच्चे के केस को फिर से रीओपन किया और सभी पहलुओं पर कड़ी निगरानी रखते हुए सुनवाई की मालूम चला की चार साल का मसूम बेगुनाह है. बात वैसे सोचने वाली है की आखिर कैसे कोई चार साल का बच्चा किसी दंगे को भड़का सकता है. मामले की फिर से सुनवाई होने के बाद कोर्ट ने बच्चे के पिता से माफ़ी भी मांगी और मुवावजा भी दिया.

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